





Thar पोस्ट। देशभर में हालात चौकाने वाले है। देश के 98,592 सरकारी स्कूलों में लड़कियों के शौचालय काम नहीं कर रहे हैं, जबकि 61,540 स्कूलों में उपयोग योग्य शौचालय ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता को लेकर जारी निर्देशों का सिर्फ कागजों पर होना पर्याप्त नहीं है, उनका जमीनी स्तर पर प्रभावी पालन भी सुनिश्चित किया जाए। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार से जुड़ा मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने सभी स्कूलों में मुफ्त बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने, लड़कियों के लिए अलग शौचालय और पर्याप्त पानी की व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा था।


हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि अधिकांश राज्यों ने यह नहीं बताया कि इन निर्देशों का वास्तव में कितना पालन हुआ है। केंद्र की रिपोर्ट में भी जमीनी स्थिति के बजाय भविष्य की योजनाओं और सिफारिशों पर ज्यादा जोर दिया गया है। बजट की कमी का मुद्दा भी उठाया गया।
नीति आयोग की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 98,592 सरकारी स्कूलों में लड़कियों के शौचालय काम नहीं कर रहे हैं, जबकि 61,540 स्कूलों में उपयोग योग्य शौचालय ही नहीं है। ऐसे में लाखों छात्राओं की पढ़ाई और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की निगरानी जारी रखने तथा हर तीन महीने में प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर निर्देशों को सिर्फ अक्षरशः नहीं, बल्कि उनकी भावना के अनुरूप भी लागू करना होगा, तभी लड़कियों को सम्मानजनक और सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण मिल सकेगा।
कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की ओर से बताई गई कमियों की जांच कर जल्द सुधारात्मक कदम उठाए जाएं। मामला डॉ. जया ठाकुर की याचिका से जुड़ा है। 30 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के स्कूलों में पढ़ने वाली कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं के लिए राष्ट्रीय मासिक धर्म स्वच्छता नीति लागू करने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने केंद्र को राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों की निगरानी रखने और हर 3 महीने में रिपोर्ट देने कहा है।