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IMG 20260523 145430 प्राचीन समय में महलों, घरों में ठंडक रखने के ये उपाय थे, एसी/कूलर तो 1930 के बाद आए Rajasthan News Portal देश
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Thar पोस्ट। राजस्थान में प्राचीन समय में नेचुरल तरीके से घरों को ठंडा रखा जाता था। लोगों ने प्रकृति को गहराई से समझा। उस समय मे पानी की कमी थी। गर्मी भी ज्यादा पड़ती थी। पुराने समय में घरों और महलों की दीवारें बहुत मोटी बनाई जाती थीं. इन्हें मिट्टी, चूना और पत्थर से तैयार किया जाता था. मोटी दीवारें बाहर की गर्मी को अंदर आने से रोकती थीं. इसके अलावा घरों में ऊंची छतें, बड़े आंगन और हवादार बरामदे बनाए जाते थे। महलों व घरों का निर्माण लॉकिंग सिस्टम से होता था। पत्थरों को लॉक किया जाता था। भूकंप बाढ़ का भी असर नही होता था। निर्माण ऐसा होता था कि इससे हवा आसानी से अंदर-बाहर होती रहती थी और घर ठंडा बना रहता था। जयपुर, जोधपुर, बीकानेर सहित अन्य जिलों में किले, महल, हवेलियों के अलावा अस्पताल भवन में आज भी गर्मी में ठंडक रहती है। बीकानेर में जूनागढ़, लक्षमी निवास, लालगढ़, रामपुरिया हवेली, गजनेर पैलेस, विजय भवन, पीबीएम हॉस्पिटल, शिक्षा भवन की इमारतें तेज गर्मी में भी हवादार होने की वजह नही तपती।

उस दौर में महलों और हवेलियों में बड़ी-बड़ी जालीदार खिड़कियां और झरोखे बनाए जाते थे. ऐसी कूलर तो बहुत बाद में आये। धूप कम आती थी लेकिन हवा लगातार चलती रहती थी. यही प्राकृतिक वेंटिलेशन घर को ठंडा रखने में मदद करता था. आज भी राजस्थान की कई पुरानी हवेलियां और किले गर्मी में अंदर से काफी ठंडे महसूस होते हैं. इसके अलावा पुराने समय में ‘खस’ का खूब इस्तेमाल होता था. खस एक खास तरह की घास होती है. इसे खिड़कियों और दरवाजों पर लगाया जाता था और उस पर पानी डाला जाता था. जब हवा खस से होकर गुजरती थी, तो ठंडी हो जाती थी. यह बिल्कुल प्राकृतिक कूलर की तरह काम करता था. इसके अलावा महलों में बड़े-बड़े हाथ से चलने वाले पंखे लगाए जाते थे. कई सेवक इन्हें लगातार चलाते रहते थे ताकि राजा और रानियों को ठंडी हवा मिलती रहे। इसके अलावा मिट्टी के घड़ों का खूब इस्तेमाल होता था. घड़े का पानी हमेशा ठंडा रहता था. लोग कमरों में बड़े मिट्टी के बर्तन रखते थे, जिससे कमरे में नमी बनी रहती थी और गर्मी कम महसूस होती थी.

बेमिसाल तकनीक आज भी कारगर
प्राचीन समय मे ईरान, अरब और मिस्र जैसे रेगिस्तानी इलाकों में एक खास तकनीक इस्तेमाल होती थी, जिसे ‘विंड कैचर’ या ‘पवन यंत्र’ कहा जाता था. फारसी भाषा में इसे ‘बादगीर’ कहते थे. यह ऊंची मीनार जैसी संरचना होती थी, जो ऊपर चलने वाली हवा को पकड़कर घर के अंदर भेजती थी. गर्म हवा ऊपर निकल जाती थी और ठंडी हवा कमरों में फैल जाती थी. इसे उस समय का प्राकृतिक एसी माना जाता था. राजस्थान के जयपुर, जैसलमेर और उदयपुर जैसे शहरों के महलों में भी हवा आने-जाने के खास रास्ते बनाए जाते थे. वहां बड़ी-बड़ी बावड़ियां और तालाब बनाए जाते थे, जिससे आसपास का वातावरण ठंडा रहता था. गर्मी के दिनों में लोग अक्सर रात में छतों पर सोते थे. खुले आसमान और ठंडी हवा की वजह से उन्हें राहत मिलती थी। समय मे बदलाव के बाद भी कई आधुनिक इमारतों में पुराने समय की इन तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है. दुबई जैसे गर्म शहरों में विंड कैचर तकनीक दोबारा लोकप्रिय हो रही है. असल में पुराने लोगों के पास एसी नहीं था, लेकिन वे प्रकृति के हिसाब से घर बनाना जानते थे.यही वजह है कि बिना बिजली के भी वे भीषण गर्मी में आराम से रह लेते थे।


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