


Thar पोस्ट न्यूज। बची हुई रोशनी में…काव्यसंग्रह का लोकार्पण

बीकानेर। यह काव्य संग्रह इस दृष्टि से दाद मुबारक योग्य है कि इसमें कवि ने अपने अनुभव और अपनी संवेदानाओं को उभारा है, इनके अनुभव उधार लिए हुए नहीं हैै। ये उद्बोधन मुख्य अतिथि पद्मश्री शायर शीन काफ निजाम ने प्रज्ञा परिवृत्त, सोशल प्रोग्रेसिव सोसाइटी, और परम्परा बीकानेर की ओर से आयोजित एडवोकेट गिरिराज मोहता की स द्यप्रकाशित काव्य संग्रह ‘बची हुई रोशनी में’ का लोकार्पण अवसर पर प्रौढ़ शिक्षा भवन सभागार में अभिव्यक्त किए।
निजाम साहब ने दुनिया पे अपना हुस्न जताने के वास्ते, अहसान किया है रूह ने, बुत-ए-खाक पे मेरे… के माध्यम से कहा कि कहा कि काव्य संग्रह की आत्मा इसकी भूमिका में बसी है। इन्होंने बड़ी ईमानदारी से लिखा है कि यह संग्रह स्वयं को सुनाई देने वाली धीम ध्वनि है। इनकी कविता में शब्दों के साथ जो जज्बाती रिश्ता देखने को मिला है वह अपने आप में यह बताता है कि कवि ने अपने अंदर और अंदर से भीतर तक की यात्रा की है और इस यात्रा में मंजिल तक पहुंचना है वह भी बची हुई रोशनी में ही।
कविता रचना प्रक्रिया के बारे में निजाम साहब ने कहा कि कविता की शुरूआत तो कवि करता है लेकिन उसे खत्म पाठक करते हैं। इसलिए जितने पाठक होते हैं उतने ही उसके अर्थ भी होते हैं। कवि कविता लिखते समय कवि को चाहिए कि उसे क्या लिखना पसंद है, फिर वह क्यों लिखना चाहता है और उसके बाद वह इस लिखने से कहां पहुंचना चाहता है। उसने क्या जाना और यह जानना ही तो समझने से जुड़ा हुआ है। एक पंक्ति में कहें तो कविता रचना स्वयं को छीलने जैसा ही होता है। जो जितना स्वयं को छीलता जाता है वह उतना ही खिलता जाता है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में साहित्यकार मधु आचार्य ने कहा कि विराट को लघु रूप में कहना ही कविता है। इस दृष्टि से यह काव्य संग्रह संवेदना, भाव और विचार की शानदार यात्रा है।
लोकार्पित काव्य संग्रह पर पाठकीय टीप करते हुए साहित्यकार श्री मालचंद तिवाड़ी ने कहा कि लेखक की रचना में अर्थ की गंभीरता है, अर्थ की अनूठी छटा है, सरलता है, विनम्रता है सार में कहें तो जीवन के विरोधाभाषों पर कवि की नजर तीक्ष्ण है।
इस क्रम में लोकार्पित कृति बची हुई रोशनी में से अपनी चुनिंदा कविताओं का वाचन करते हुए गिरिराज मोहता ने जाने कितने दौर बरसे हैं इस सावन में बादल, तब कहीं जाकर उन्हंे मेरी आंखों सा सब्र आया है…, दिलों दिमाग की कशमकश में कुछ तो टूटेगा जरूर, एक इक तरफ दिल है मेरा इक तरफ मेरा गुरूर…..जैसी काव्यपंक्तियों का वाचन किया, तो सदन करतल ध्वनि से गूंज उठा।
कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों का स्वागत शॉल, साफा और स्मृतिचिन्ह प्रदान कर किया गया। स्वागत उद्बोधन नदीम अहमद नदीम ने दिया। उन्होंने कहा कि इस संग्रह का आना नगर, प्रकाशन और संस्था के लिए गौरव का क्षण है।
कार्यक्रम में यशस्वी कवि डॉ. नंदकिशोर आचार्य, वरिष्ठ अधिवक्ता दाउलाल पुरोहित, एस.एल.हर्ष, डॉ.उमाकांत गुप्त सहित नगर के विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि व्यक्तित्व प्रबुद्ध और गणमान्य लोगों की उत्साही उपस्थिति ने आयोजन को सफलता प्रदान की।
कार्यक्रम का प्रभावी संयोजन करते हुए प्रो.ब्रजरतन जोशी ने लोकार्पित कृति की रचनभूमि, आगंतुक अतिथियों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए शहर के रचनाकर्म में डॉ.छगन मोहता, डॉ.श्रीलाल मोहता की लेखन परम्परा में गिरिराज मोहता की लेखन यात्रा को महत्वपूर्ण एवं सार्थक शुरूआत बताया।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर सुख्यात प्रकाशक दीपचंद सांखला ने आयोजक संस्थाओं की ओर से आगंतुक अतिथियों एवं आकंठ सदन के प्रति आभार व्यक्त किया।
