






Thar पोस्ट। रेल से पहुँचे जा सकने वाले यूरोप के सबसे ऊँचे पहाड़ पर जाने की योजना बन रही थी। मैं सोच रहा था कि इस प्रकार के काम बच्चों व नौजवानों के लिए उचित हैं। अदिति और उसके मित्र निहार का कहना था कि वहाँ जाने का बहुत अच्छा प्रबंध है। युंगफ़्राओ ग्लेशियर बर्फ़ से ढका हुआ और बर्फ़ानी हवाओं वाला इलाक़ा है, मन में जाने की इच्छा भी थी और घबराहट भी। बच्चों के जोश बढ़ाने पर हम कार में बैठ कर इंटरलाकन शहर की ओर चल दिए। इंटरलाकन स्विट्ज़रलैंड का एक ऐसा शहर है कि उसके इलाक़े में भारत की अनेकों फ़िल्में बनी हैं। हरी-भरी उन वादियों में फ़िल्मी गीतों का फ़िल्माया जाना बहुत आकर्षक रहा है। चीन व अन्य देश भी इस क्षेत्र में आकर फ़िल्में बनाया करते हैं। यश चोपड़ा का यह पसंदीदा शहर मानो पूरा ही फ़िल्म स्टूडिओ हो।

अदिति ने कार पार्क की और हम सामने ही बने हुए रेल्वे स्टेशन पर चले गए। ‘लॉटरब्रुनन वैली’ की ट्रेन में हमने अपना स्थान ग्रहण किया। सबसे ऊँचे पहाड़ पर ट्रेन जाएगी, यह सोचकर रोमांच हो रहा था। ट्रेन की व्यवस्था बहुत उत्तम थी। चीन का एक बड़ा समूह वहाँ मिला। रेल्वे की व्यवस्था करने वालों ने पहले उस बड़े समूह को ट्रेन में बैठाया और फिर हमें। ट्रेन अपनी गति से आगे बढ़ने लगी। इस घाटी से माउंटेन ट्रेन सीधे पहाड़ की चोटी पर ले गई। जहाँ-जहाँ फोटोग्राफ़ी की जा सकती थी, वहाँ ट्रेन रुकती थी। एक गुफनुमा रेल्वे स्टेशन के भीतर बर्फ़ की वादियों के बीच अब हम ऊपर की चोटी पर पहुँच चुके थे। विज्ञान ने क्या क्या कमाल किया कि माउंटेन ट्रेन ग्लेशियर की ऊँची से ऊँची चोटी पर कुछ ही समय में ले आई। साफ़-सुथरा स्टेशन सभी सुविधाओं से सुसज्जित था। अब तो आगे बढ़ने के लिए पैदल ही चलना था। निहार हमारा गाइड बन गया। कभी हम उसका सहारा लेते व कभी हम उससे ज्ञान लेते।
एक खुले प्लेटफ़ॉर्म से हमने नीचे झाँक कर देखा। सफ़ेद रुई की मानिंद बर्फ़ ही बर्फ़ और गहरी खाई। अगर कोई नीचे चला गया तो उसकी बर्फ़ समाधि पक्की थी। इतनी ऊँचाई पर हमें एक गोल गुम्बद दिखाई दिया। वैज्ञानिक वहाँ से पर्यावरण और धरती पर होने वाली हलचलों का अध्ययन करते हैं। गुम्बद के अंदर सम्भवतया इसके उपकरण होंगे। इस साइन्स स्टेशन पर होने वाले शोध धरती की जान बचाने वाले इंसानों की बेहतरीन कोशिश है। फिर हम पहुँचे Ice-cave (बर्फ़ की गुफा) में जहाँ जीव-जंतुओं की बर्फ़ से बनी कलाकृतियाँ बनी थी जो देखते हुए हम आनंद व आश्चर्य के साथ चल रहे थे। अगर यहाँ फिसल गए तो क्या हो? बाहर बर्फीला तूफ़ान शुरू हो गया था। हमें वहाँ हिंदुस्तानी भाई मिल गए। लद्दाख के रहने वाले उस सज्जन ने हमें लिफ़्ट के ज़रिए नीचे एक रेस्टोरेंट तक पहुँचाया।
इतनी ऊँचाई तक रेल ले जाना कोई आसान काम तो नहीं रहा होगा। हम तो सुविधाओं का आनंद ले रहे थे लेकिन कुछ मेहनतकशों ने खुले आकाश के नीचे बर्फीले तूफ़ानों के बीच जो काम किया, वो कमाल का ही था। इस स्थान को बनाने में कुछ लोगों की जानें भी गई। प्रबंधन ने उन सभी का नाम लिख कर उनका स्मारक भी बना रखा है। यह सब तो था ही, बिजली का प्रबंध भी तो मुश्किल काम रहा होगा। बग़ैर बिजली कुछ भी नहीं चल सकता। ग्लेशियर की चोटी पर बॉलीवुड रेस्टोरेंट में हिंदुस्तानी खाना उपलब्ध था। थोड़ा विलम्ब हो जाने के बावज़ूद हमें उदारता के साथ स्वादिष्ट भोजन करवाया गया। अपने आप लो, अपने आप खाने के बाद अपनी प्लेटों को समुचित स्थान पर रख दो। पैसे तो बहुत लगे लेकिन यूरोप की ट्रेन से पहुँचे जाने वाली सबसे ऊँची चोटी पर खाना खाने का लोभ हमें भी था। भाषा की असुविधा के बावज़ूद सब कुछ सरस था। अदिति को फ़्रेंच भाषा आने से कोई परेशानी नहीं हुई।
स्विट्ज़रलैंड के सभी मुख्य पहाड़ों पर अत्याधुनिक केबल कार का भी प्रबंध होता है। एक केबल कार के द्वारा हम तारों पर लटकते हुए नीचे उतरने लगे। केबल कार के अंदर जो नयन सुख हमें मिल रहा था, उसका वर्णन शब्दों में तो नहीं किया जा सकता। तलहटी में पहुँचने पर रेल्वे स्टेशन के पास ही हमें चाय की दुकान मिल गई जिस पर लिखा था – ‘चड्डीफाड़ चाय’। हैदराबाद के रहने वाले एक सज्जन इस रेस्टोरेंट को चलाते हैं। उन्होंने हमें गर्मागर्म चाय के साथ समोसे खिलाए। हमें वहाँ एक अफ़ग़ानी युवक भी मिला। वो हिंदी में हमें कुछ सम्बोधन कर रहा था। एक दूसरे से मिल कर हमें बहुत अच्छा लगा।
भारतीय फ़िल्म निर्माता यश चोपड़ा को इंटरलाकन शहर बहुत पसंद था। वे यहाँ अक्सर आया-जाया करते थे। जो फ़िल्में वे बनाते थे, उनसे सम्भवतया इस शहर की ख़ूब आमदनी होती थी। स्विट्ज़रलैंड की सरकार ने यश चोपड़ा को इंटरलाकन क्षेत्र का ऐम्बैसडर बना रखा है। उनकी यादें ताज़ा रखने के लिए उनकी एक मूर्ति व स्मारक वहाँ बनाया गया है। चीन वाले भी यहाँ बड़ी तादाद में आते हैं। चीन के फ़िल्म निर्माता भी इस लोकेशन पर बहुत फ़िल्में बनाते हैं। हम भी यश चोपड़ा की मूर्ति के साथ फ़ोटोग्राफ़ी कर घर के लिए रवाना हो गए। थुन झील के किनारे किनारे चलते हम फ्रीबुर्ग के लिए आगे बढ़ रहे थे। आसमान में छिपते हुए सूरज व बादलों की आँख-मिचौली ने आसमान की रंगत को नशीला बना दिया था।** वरिष्ठ पत्रकार अशोक माथुर की कलम से हर रविवार जारी….
