





Thar पोस्ट न्यूज। स्विट्ज़रलैंड व यूरोप में चॉकलेट खूब खाई जाती है। भाँति-भाँति की चॉकलेट्स हर उम्र के लोग छोटे बड़े कार्यक्रम के बाद खा ही लेते हैं। दुनिया भर में चॉकलेट्स का निर्यात भी होता है। हर ख़ुशी को चॉकलेट खिला कर रसमय बनाने की संस्कृति प्रायः सभी देशों में पनप गई है। हम चॉकलेट फ़ैक्टरी देखने पहुँचे। चॉकलेट बनाने की प्रक्रिया तथा उसके इतिहास को जानने की इच्छा थी। अन्य भी बहुत से लोग ये फ़ैक्टरी देखने आए थे। एक नुमाइश की तरह फ़ैक्टरी में दिखाने व समझाने का अच्छा प्रबंध था। चॉकलेट का मुख्य तत्व एक बीज होता है जो हल्की सी कड़वाहट भी लिए होता है। कोकोआ नाम का यह बीज अफ़्रीका और ब्राज़ील आदि देशों से यहाँ आता है। स्विट्ज़रलैंड की गायों का दूध उसे स्वादिष्ट बना देता है।

जिन इलाक़ों से यह बीज आता है, पता लगा कि उसका उत्पादन करने वाले लोग आज भी बड़ी ही दीन-हीन हालत में रहते हैं। विकास के वर्तमान अर्थशास्त्र में दलाल और फ़िनिश्ड गुड्स बनाने वाले लोग तो मालामाल हो जाते हैं लेकिन मिट्टी से खेती करके मूलभूत बीज पैदा करने वाले की स्थिति अगर बेहाल हो तो वर्तमान प्रणाली पर हर किसी को चिंतन करना चाहिए। जैसे औद्योगिक क्रांति के वक्त मार्क्स ने एक तत्व पकड़ा था कि यांत्रिकी उत्पादन प्रणाली में एक नया मज़दूर वर्ग सामने आएगा। पूरा इंसानी समाज दो वर्गों में खंडित हो जाएगा और अब यह दिख भी रहा है। चॉकलेट का स्वाद हर वर्ग के लोगों को अच्छा लगता है। इससे होने वाले मुनाफ़े से क्या अफ़्रीका की हालत नहीं बदली जा सकती? चॉकलेट फ़ैक्टरी के प्रबंधन ने कोकोआ का पैदा होना व उसके यूरोप आने की कहानी को ईमानदारी से दर्शाया था। हो सकता है कि मेरे जैसे भावुक लोगों को विसंगतियाँ जल्दी नज़र आ जाती हैं। फ़िलहाल तो चॉकलेट मुँह में जाने पर उसके स्वाद और अपनी बेबसी के कारण हम फ़ैक्टरी की सराहना करते हुए खुले आकाश के नीचे आ गए। मुँह और जेब में चॉकलेट रख कर सभी पर्यटक प्रसन्नचित दिखाई दे रहे थे।
चॉकलेट फ़ैक्टरी में आने से पहले हम चीज़ फ़ैक्टरी भी गए। इस फ़ैक्टरी में भी आगंतुकों के साथ अच्छे व्यवहार के साथ-साथ सारी प्रक्रिया समझाने का बढ़िया प्रबंध था। हमारे कानों पर हेड-फोन लगा दिए गए जिसमें एक गाय अपनी पूरी कहानी सुनाती है। गाय दूध निकालने और उसकी रासायनिक जाँच की बात से लेकर चीज़ बनाने तक की सारी प्रक्रिया बताती है। बतौर गाय पता लगा कि वहाँ की गाय 100 किलो घास खाती है और 85 लीटर पानी पीती है। फिर इंसानों को 25 लीटर दूध सुबह और 25 लीटर शाम को देती है। वहाँ पशुपालक गाय को खुले हरे-भरे मैदानों में चराते हैं। पशुपालक द्वारा पुकारे जाने पर वो बड़े-बड़े लकड़ी के बने बाड़ों में पहुँच जाती हैं जहाँ यांत्रिक विधि से दूध निकाला जाता है और फिर पशुपालक इस प्रकार की चीज़ फ़ैक्टरियों तक दूध पहुँचा देता है। जिस चीज़ फ़ैक्टरी में हम गए थे, वहाँ आसपास के इलाक़े का ताज़ा दूध आता है। पशुपालकों की सहकारी समिति या संगठन इसका प्रबंधन करते हैं। किसी बिचौलिये या दलाल का तो पता नहीं चला। भारत में दूध उत्पादकों की सहकारी संस्थाएँ भी हैं और दूध प्रॉसेस करने की फ़ैक्टरियाँ भी। लेकिन सहकारी क्षेत्र में पूरी प्रक्रिया सिर के बाल उल्टी खड़ी है। सहकारी समितियों में चुनाव होते हैं, लोग चुने भी जाते हैं लेकिन हुकूमत नौकरशाहों की चलती है। लाभ-हानि का आँकड़ा भी उनके या बड़े नेताओं के हाथ में होता है। पशुपालकों की आवाज़ को कोई नहीं सुनता। फलतः निजी क्षेत्र में दलालों तथा सिन्थेटिक दूध के माफिया पनप रहे हैं। स्विट्ज़रलैंड में गाय के लालन-पालन और उत्पाद की बिक्री में गौ-पालक की महत्त्वपूर्ण भूमिका लगी।
अब तो यूरोप के कई देशों में इस क्षेत्र में भारत के पंजाब से गए बहुत से युवक उतर आए हैं। उन्हें वहाँ अपने काम से संतुष्टि लगी होगी, इसी लिए वे पहले नौकरी करते हैं फिर ज़मीन ख़रीदकर गौ-पालक या किसान भी बन जाते हैं। ऐसा हमें इटली में भी पता लगा था। गायों और जीव-जंतुओं से लगाव रखने वाले व्यक्तियों को यूरोप के पशुपालकों और चारागाह विकास से सीखना चाहिए व आडम्बर और पाखंड त्याग कर गाय व अन्य जीवों को उनकी प्राकृतिक आवश्यकताओं के अनुसार रखना चाहिए न कि सिन्थेटिक दूध, घी, मावा, चीज़ आदि से धन कमाने की होड़ करनी चाहिए। स्विट्ज़रलैंड में स्वास्थ्य के लिए क्वालिटी पर विशेष ध्यान दिया जाता है, जिसका लाभ इंसानी नस्ल को भी तो होता है। खाद्य वस्तुओं की शुद्धता और गुणवत्ता की गारंटी होती है। जारी संपादक वरिष्ठ पत्रकार अशोक माथुर की कलम से ….प्रति रविवार