FB IMG 1785664373649 यूरोप की यात्रा में इस बार विख्यात चिड़ियाघर, गुजरात के बब्बर शेर भी Rajasthan News Portal पर्यटन
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Thar पोस्ट न्यूज। विश्व प्रसिद्ध ज़्यूरिक का चिड़ियाघर एक तरह से अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना का केंद्र है। एशिया, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, अफ़्रीका, मैडागैस्कर आदि जगह जगह से लाए गए जीव-जंतु इस चिड़ियाघर में जिन स्थानों से वे आए हैं, उसी तरह की आबो-हवा में रहते हैं। वे पिंजरों में क़ैद होने के बजाय बड़े बड़े बाड़ों में रखे गए हैं जहाँ उनके लिए स्वच्छंद रूप से घूमने फिरने की जगह है। उन्हें सिर्फ़ खाना ही नहीं खिलाया जाता बल्कि खेल भी खिलाया जाता है।

टिकट लेकर हम अंदर गए। मासोला एक्सप्रेस नामक छोटी ट्रेन में बैठ कर हम आगे बढ़े। चिड़ियाघर में अलग-अलग महाद्वीपों के हिसाब से बहुत सारे क्षेत्र थे जिनके बीच का सफ़र यह ट्रेन सुगम कर देती थी। आज हाथियों के नहाने का दिन निर्धारित था लेकिन किसी वजह से यह गतिविधि नहीं हो पाई। थायलैंड से लाए गए हाथियों के लिए एक समुचित तालाब था जिसमें वो तैर सकें। कृत्रिम रूप से वर्षा का प्रबंध भी किया गया था। उनकी खुराक को ऊँचे ऊँचे पेड़ों पर लटकाया गया था ताकि वे प्राकृतिक रूप से सूँड़ को ऊपर का खाना प्राप्त करने का जतन कर सकें। वे भी आनंद में ही लग रहे थे और हमारे जैसे अनेक दर्शक भी उनकी हलचल का आनंद ले रहे थे। हाथियों के निवास स्थान के बाहर एक शेड के नीचे हाथियों की लीद से काग़ज़ बनाने की प्रक्रिया का प्रदर्शन किया गया था। एक 4×8 की मशीन से हाथी की लीद काग़ज़ व शुभकामना संदेश देने वाले कार्ड में बदल जाती थी। यह प्रक्रिया बड़ी आसान और हाथों-हाथ होने वाली थी। वस्तुओं को रीसाइकल करने से प्रकृति का बचाव हो सकता है।

चिड़ियाघर के अंदरूनी मार्ग पर दो महिलाएँ बौने घोड़ों को घूमा रही थीं। एक घोड़ा कुछ नाराज़ लगा, वो प्रेम से उसको समझा-बुझा कर अपने साथ चला रही थीं। यह सब देखते देखते हम एक गुफानुमा गेट से मैडागैस्कर की तर्ज़ पर बने कृत्रिम रेनफ़ोरेस्ट में आ गए। ऊँचे ऊँचे पेड़ों पर छोटे बंदर कलाबाज़ियाँ खा रहे थे और पक्षी अपना-अपना राग आलाप रहे थे। हमने पेड़ों के तने पर रंग बदलते गिरगिट व अन्य छोटे-मोटे जीवों के साथ साथ विशाल आकृति वाला कछुआ भी देखा। रेनफ़ोरेस्ट में ऐसा लग रहा था कि सभ जीव-जंतु आज़ाद हैं और दो पैरों पर खड़े हमारे जैसे जीवों को देख कर हमारी मज़ाक़ उड़ा रहे हैं। बहुत व्यवस्थित एक कैंटीन में हमने खाना खाया और कॉफ़ी पी लेकिन नज़रें कैंटीन से बाहर ही गढ़ी रहीं। छोटे-बड़े पक्षी व पानी में तैरने वाले जीव व बतखें पानी में किलोलें कर रहे थे।

रेनफ़ोरेस्ट से बाहर अफ़्रीका की तर्ज़ पर बना सवाना का जंगल देखा जहाँ गेंडे, जिराफ़ व ज़ेब्रा थे। चिड़ियाघर में छोटे बच्चों के लिए मिनी-जेसीबी मशीन लगी थी। बच्चे एक जगह से मिट्टी उठाते व दूसरी जगह डालते। इस प्रकार श्रम की साधना का संस्कार स्वतः ही नई पीढ़ी में आ जाता है। आगे बढ़ने पर हमने ऑस्ट्रेलिया में प्रवेश किया जहाँ कंगारू ऐसे बैठे थे जैसे गाँव की चौपाल पर बुज़ुर्ग बैठ कर कोई चर्चा कर रहे हों। फिर हम पेंग्विन की तरफ़ बढ़े और अंत में हमने सील का शो देखा। सील पानी में तैरती भी हैं और ज़मीन पर रेंगती भी हैं। एक महिला उन्हें बॉल से खिला रही थी। वो बॉल को दूर फेंक देती और सील पानी में जल्दी से तैरकर महिला तक वापस ले आती। हमारी पालतू ब्रूनी भी ऐसा किया करती थी। मुझे उसकी याद आ रही थी। खेल के साथ-साथ वह महिला उन्हें खाने को भी देती थी। उनके हाव-भाव से लगता था कि इस खेल में सील को बहुत आनंद आ रहा था। कभी-कभी वो दर्शकों की तरफ़ देख कर भी अपनी पूँछ हिलाने लगती थीं।

इसी ज़ू में विशालकाय वनमानुष और छोटे वनमानुष देखे – गुरिल्ला और ओरांगुटान। उनका पारिवारिक गठबंधन और अनुशासन भी देखा। इनको भी इनके मूल स्थान के वातावरण में रखा गया था। वे पेड़ों पर चढ़ते, कूदते और उतरते। एक छोटे से लकड़ी के बक्से में कुछ कीड़े रखे गए थे। वनमानुष तिनका उठाता, और बक्से के छेदों से उन्हें निकालकर खाता व आनंद लेता। ज़्यूरिक के चिड़ियाघर में गुजरात के गिर जंगल से लाए बब्बर शेर भी थे लेकिन उनके और स्वच्छंद विचरण करने हेतु इलाक़ा बड़ा करने का काम ज़ारी था जिसके चलते हम उन्हें नहीं देख पाए।

चिड़ियाघर से बाहर निकलते हुए ख़्यालों की दुनिया में ऐसा लग रहा था कि हम सब एक चिड़ियाघर के अंदर ही तो हैं। इन सब जीवों के बीच हम भी एक जीव हैं। लेकिन ये ग़लतफ़हमी कितनी ख़तरनाक है कि हम अपने सुख के लिए प्रकृति के मालिक बनने की कोशिश कर रहे हैं। पहले कभी एक फ़िल्म देखी थी, उसमें धरती पर बंदरों का राज़ हो जाता है। ऐसे ही सोचते-विचारते हम वापस फ्रीबुर्ग के लिए रवाना हो गए। वरिष्ठ पत्रकार अशोक माथुर की कलम से।


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