





Thar पोस्ट। इटली से स्विट्ज़रलैंड के रास्ते में चारों ओर पहाड़, बर्फ़, झरने, हरे-भरे खेत, साफ़-सुथरे गाँव देखते देखते हम एक 6-8 किमी लम्बी सुरंग में से निकले। इस सुरंग को इस प्रकार से बनाया गया है कि हम एक ओर से बाहर का नज़ारा भी देख सकते हैं। बनाने वालों ने एक ऐसी तकनीक का प्रयोग किया कि प्रकृति को कम से कम नुक़सान हो। ग्लेशियर, बर्फ़, झरने और नदी के साथ साथ बड़े व छोटे वृक्ष पूरे सामर्थ्य से यात्रा को उबाऊ व थकाऊ बनाने से रोक रहे थे। निर्धारित स्थानों पर गाड़ी रोक कर प्राकृतिक नज़ारों को कैमरे में क़ैद किए जाने की भी व्यवस्था थी। हमने भी ऐसा किया। उन स्थानों पर भी कचरा पात्र उपलब्ध थे। वहाँ आने वाले पर्यटक व स्थानीय लोग कचरा पात्रों का सही ढंग से इस्तेमाल भी करते हैं। इसीलिए सड़क हो या सुरंग, झरने और मैदान, नदी और नाले सभी चकाचक साफ़ रहते हैं। यही वो कारण है कि पीने का पानी किसी भी झरने से लिया जा सकता है।

मिड-वे की व्यवस्था भी बहुत उत्तम थी। आवश्यकता की वस्तुओं के साथ साफ़-सुथरे शौचालय उपलब्ध होने से लयबद्ध अनुशासन यात्रियों में आ ही जाता है। इटली को छोड़ते हुए मुसोलिनी भी याद आ रहे थे। इतिहास में सभ्यता के रास्ते भी इतने ही टेढ़े-मेढ़े थे, जितने कि पहाड़ के। शासकों की बात करूँ या न करूँ, लेकिन प्रजा तो महत्त्वपूर्ण ही है। अपने अनुभवों को एक बुरे सपने की तरह भूल जाती है। मानव सभ्यता आज जिस मुक़ाम पर है, वहाँ भी संघर्ष तो बहुत है। फिर भी पुराने रक्त रंजित इतिहास से हम बेहतर ज़िंदगी की ओर आगे बढ़े हैं। विज्ञान और तकनीकी ने पुराने अंधविश्वास और ढकोसलों को खंडित किया है। लोगों ने जीयो और जीने दो के महत्त्व को समझा है। इटली की सीमा सुरंग ख़त्म होने के साथ ही ख़त्म हो जाती है। पहाड़ी रास्ते पर सूरज की चमक आल्हादपूर्ण स्वागत करती है। एक सीमा बदल जाने पर ही वातावरण में फ़र्क़ आ जाता है जो महसूस किया जा सकता है।
फ्रीबुर्ग के रास्ते में पेट्रोल-पम्प पर मेरी पत्नी बाला माथुर ने पेट्रोल भरा। यह अनुभव रोमांचकारी था। जिनेवा झील के आने से पूर्व ही अंगूरों की खेती का इलाक़ा चालू हो गया। झील के आसपास अंगूरों के खेत थे और हरे-भरे मैदानों में गाएँ चरती हुई दिखाई दे रही थी। गाय की पूजा करें या न करें, किंतु उसकी भरपूर सेवा की जाती है। प्रतिफल में गाय भी भरपूर सेवा करती है। उत्पादन और उपभोग के इस युग में व्यावसायिक नज़रिया हो सकता है लेकिन गाय की आज़ादी और ख़ुशी ये बताती है कि उनको पालने वाले अच्छी तरह से उनका लालन-पालन कर रहे हैं। इसीलिए सड़कों, गलियों व चौराहों पर वे दिखाई नहीं देती। गौ भक्ति के लिए ज़रूरी है गोचर कि भक्ति। गाय के चरने के स्थानों को बेहतर ढंग से व्यवस्थित किया जाए तो गाय के साथ अन्य जीव-जंतु भी मानव निर्मित शहरों व गाँवों में कचरा क्यों खाएँगे। घोड़े, भेड़ व सूअर पालने का भी यूरोप में शौक़ है। वे सब भी व्यवस्थित ढंग से रहते हैं। जब तक जीते हैं, शान से जीते हैं।
फ्रीबुर्ग के रास्ते से ही अदिति ने हमारे लिए एक पंजाबी रेस्टोरेंट में डिनर का ऑर्डर कर दिया। रेस्टोरेंट के पास गाड़ी पार्क करने में पंजाबी भाई ने हमारी मदद की। रेस्टोरेंट में घुसते ही सरदार जी व उनकी पत्नी व बच्चों को देख कर दिल बाग-बाग हो गया। मेरे मुँह से तो निकल ही गया – तुसी कींवे हो? ऐसा लग रहा था जैसे दो बिछड़े हुए भाई मिल रहे हों। छोटे से स्थान पर फ्रीबुर्ग रेल्वे स्टेशन के पास व्यवस्थित रूप से चल रहे इस रेस्टोरेंट में सबके लिए बंदोबस्त था। रेस्टोरेंट ‘होस्ट इंडिया’ की सुव्यवस्था पंजाब दी कुड़ियाँ कर रही थीं। उन्होंने बड़ी ख़ुशी से हमारी इच्छा के मुताबिक़ पनीर की सब्ज़ी, बैंगन का भर्ता व दही हमें खिलाया व हमें बहुत आदर दिया। खाने-पीने के बाद जब बिल की बात हुई तो सरदार जी ने मना कर दिया। उन्होंने हमारी तुलना अपने बुज़ुर्गों से की। भावपूर्ण वातावरण में मैंने उन्हें समझाया कि ये आपका कारोबार है। जब आपके घर आएँगे तब बिलौने वाले मक्खन से खाना खाएँगे, गप्पें मारेंगे और मज़ा करेंगे। बड़ी मुश्किल से अदिति से उन्होंने कुछ भुगतान लिया। पंजाब के लोग आव-आदर के मामले में बड़े दरियादिल होते हैं। वहाँ से निकल कर हम घर आए और कुछ चर्चाओं के बाद रज़ाई में घुस कर सो गए। इटली की लम्बी यात्रा से थक गए थे। जारी हर रविवार ….संपादक अशोक माथुर की कलम से …