FB IMG 1780819960375 यूरोप की यात्रा -भाग 5 : राजस्थानी हवेलियों की तरह इमारतें वहां भी ! Rajasthan News Portal अंतरराष्ट्रीय, पर्यटन
Share This News

हमने जीवन-काल में इटली के ऐतिहासिक शहर वेनिस की तस्वीरें तो बहुत देखी थी, लेकिन वेनिस में हम रुकेंगे और पानी से भरे रास्ते में नावों से यात्रा करेंगे, यह रोमांचक अनुभव था। इतिहास में इस शहर ने अच्छे व बुरे, दोनों तरह के दिन देखे हैं। विज्ञान के माध्यम से इन्होंने कला व संस्कृति को भी बचाया और आधुनिक निर्माण भी किया।वेनिस पहुँचने पर हम कार पार्किंग की ओर बढ़े, हमें 10वीं मंज़िल पर स्थान मिला। वहाँ से समुद्र के बैकवॉटर का पहला दृश्य देखा, पुरानी इमारतें और बिजली से चलती बसें, पानी में चलती नावें, सब अद्भुत था। यह सोचने की बात है कि कब सिमेंट वज़ूद में नहीं आया था, तब इतनी भव्य इमारतें और वो भी पानी के बीच, कैसे बनाई गई होंगी। बैकवॉटर की जो नहरें थी, वो भी काफ़ी प्रश्न खड़े कर रही थी। एक लिफ़्ट के ज़रिए हम 10वीं मंज़िल से धरती पर आ गए और एक पुल पार कर के मोटरबोट तक पहुँचे। इसका टिकिट भी एक ऑटोमैटिक मशीन से लिया था, फिर हम एक बोट में सवार हो गए। बोट से हम अपने स्थान पर उतार गए जहाँ कला और संस्कृति से जुड़ी कोई जानकारी थी। छोटी-बड़ी गलियों और पुलों को पार करते हुए हम अपने रात्रि विश्राम-गृह की ओर जा रहे थे। उन गलियों से निकलते वक्त अड़ोस-पड़ौस के मकानों पर नज़र जाती तो राजस्थान की हवेलियों की यादें ताज़ा होने लगती। उनकी वास्तुकला भी ऐसी ही थी। या तो यूरोपियन देशों से हमने सीखा या उन्होंने हमसे, बात तो एक ही है।

जब हम अपने गंतव्य की ओर बाढ़ रहे थे, उसके पास ही एक बोर्ड दिखा, जिस पर लिखा था – ‘माधवी पारेख, मनु पारेख, चाणक्य फ़ाउंडेशन, कॉस्मिक गार्डेन, आर्ट & सोशल क्लब। अपनापन दर्शाता उनकी हवेली का यह दरवाज़ा यह बता रहा था कि दूर देश में कोई हमारा भी है। यह परिवार गुजरात या राजस्थान का लग रहा था। इसी उधेड़बुन में हम हमारी हवेली पर पहुँच गए। घंटी बजाने पर एक सज्जन ने दरवाज़ा खोला और मुस्कुराहट के साथ हमें अंदर बुलाया। अंदर घुसते ही बड़ा अजीब लग रहा था कि कहाँ आ गए। सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर गए तो मन बदला। शाही ठाठ-बाठ वाला कमरा, एंटीक फ़र्निचर, सब आनन्द्दायक था। सबसे ज़रूरी चीज़ थी, शौचालय व स्नानगृह, जो तो विचित्र ही थे। एक पतले गलियारे का सदुपयोग कर उसमें सब आधुनिक सरंजाम लगाए हुए थे। खिड़की से बाहर झांकने पर बैकवॉटर की कैनाल दिखती थी। यूरोपियन कमोड के ऊपर ऐतिहासिक चैन वाला फ़्लश का सिस्टम था। मैं सोच रहा था कि यहाँ तो पैर फिसलने पर भी गिरने की जगह नहीं है।

अगली सुबह हम तैयार हो कर वेनिस शहर का नज़ारा देखने के लिए बाहर निकल गए। कुछ गलियाँ पार करने के बाद हमें श्रीलंका के प्रवासी भाई की दुकान दिखी। एक दूसरे को देख कर एक ख़ुशी का माहौल बन गया। दूर जाकर हम कितने नज़दीक हो जाते हैं। इस भाई ने हमें गाइड भी किया और बताया कि सीधे जाने पर हमें गोंडोला कश्ती मिलेगी। धन्यवाद की औपचारिकता के साथ हमने उससे कुछ फल भी ख़रीदे और निकल पड़े बैकवॉटर की नहर के पास। नहर पर गोंडोला कश्ती बुक करी और उसी से घूमते-घूमते मार्को-पोलो के घर के आगे से निकले। ये कश्ती एक युवक चला रहा था। स्थानीय सरकार इन पर नियंत्रण भी रखती है जिससे इनका किराया भी निर्धारित होता है। कुछ देर घुमाने के बाद उसने हमें वापस छोड़ा। हम सोच रहे थे, लंच क्या करना है। इटली आए हैं तो इटालियन पिज़्ज़ा ही खाया जाए।

गूगल भगवान की गाइडलाइन व स्थानीय लोगों से पूछताछ कर एक विशाल चौक में स्थित रेस्टोरेंट में पहुँचे, पिज़्ज़ा का ऑर्डर दिया व ठंडा पेय पिया। यहाँ बैठे-बैठे जीव-जंतुओं व इंसानों के बीच एक निर्भीक रिश्ता दिखाई दे रहा था। कबूतर ऐसे थे कि इंसानों से डरते ही नहीं। बिल्लियाँ भी बेडर घूम रही थी। कुत्ते ज़रूर अपने मालिकों के साथ थे। माहौल उल्लासपूर्ण था। बग़ैर किसी शोर-शराबे के सब ख़ुश ही लग रहे थे। एक दूसरे को अभिवादन कर रहे थे, मुस्कुरा रहे थे। इस चौक के बीचों-बीच कोई पुराना कुआँ था, जिसे जाली से ढक दिया गया था। किसी जमाने में यही पेयजल का स्त्रोत रहा होगा। ऐसे चौक राजस्थान के शहरों में भी होते हैं। लेकिन वेनिस में उन्हें पर्यटन व व्यवसाय के अनुकूल रखा गया है। चारों ओर की इमारतें अपनी ऐतिहासिक भव्यता को बनाए हुए हैं। उनके नीचे की दुकानें आधुनिक साजो-सामान व खाने-पीने की वस्तुओं से भरी थी। स्वादिष्ट पिज़्ज़ा खाने के बाद हम चले अपने ठहरने के स्थान की ओर। गूगल का सहारा लिया लेकिन रास्ते को तो पैरों से ही नापना पड़ता है। उन गलियों में कोई वाहन नहीं चल सकता और कुछ तो इतनी छोटी व संकरी हैं कि ज़्यादा आदमी भी क्रॉस नहीं कर सकते। ऐसी संकरी गलियों को देख कर राजस्थान के अजमेर में स्थित गालियाँ विशेषकर राजाजी की गली चित्रित हो उठी, जो कायस्थ मोहल्ले से लेकर हमारी ‘अमर प्रेस’ तक जाती थी।

भारत की गलियों और वेनिस की गलियों में भारी अंतर था। वेनिस की गलियों में आवारा पशु और गंदगी दिखाई नहीं देते। दुनियाभर से भाँति-भाँति के पर्यटक वहाँ आते हैं और उनकी अपनी-अपनी आदतें होती हैं। वे जो कचरा और बोतलें इत्यादि होती हैं, उन्हें सम्भवतया बैकवॉटर में भी फेंक देते हैं। लेकिन बैकवॉटर की गलियों को साफ़ रखने के लिए कुछ यांत्रिक नावें चलती रहती हैं। जैसे-तैसे हम अपने होटल में पहुँच गए। चलने फिरने में असुविधा होने के कारण मैं तो बहुत थक गया था, सोना ही उचित लगा।

इटली पर जब छोटे बड़े हमले हुआ करते थे, उनसे बचने के लिए लकड़ी के लट्ठों व बड़े बड़े पत्थरों पर वेनिस शहर को समुद्र के बीच बसाया गया था। कुदरत से की जाने वाली छेढ़छाढ़ ने कई सैंकड़ों साल पुराने इस शहर पर विपदा पैदा कर दी है। समुद्र का ज्वारभाटा तो बाढ़ लाता ही है, जलवायु परिवर्तन के कारण निरंतर बढ़ते जल स्तर के कारण यह पर्यटन केंद्र डूबने के कगार पर है। हमें ऐसा लगा कि यहाँ का सामाजिक ताना-बाना भी बिखर रहा है। हज़ारों परिवार वेनिस छोड़ कर नई जिंदगी की तलाश में बाहर चले गए हैं। परंतु डूबते हुए इस शहर में पर्यटकों की भरमार है।

समुद्र के बीच इंसान द्वारा निर्मित अद्भुत वास्तुकला के इस शहर को बचाने की चिंता यूरोप में की जा रही है। इटली की सरकार ने भी समुद्र के पानी को रोकने के लिए इस प्रकार का बांध बनाया है जो ज़रूरत पड़ने पर ऊँचा-नीचा हो सकता है। इस बांध में पानी भरा जाता है, रेत भरने का सरजाम भी किया जाता है। कहते हैं – भारत में द्वारिका डूब गई और उसके अवशेष अरब सागर में मौजूद हैं। दुनिया के और भी इलाक़ों में भू-गर्भीय परिवर्तनों और जलवायु परिवर्तन से सभ्यताओं का विकास और पतन तथा गुम होने का सिलसिला आदिकाल से चलता आ रहा है। विशेषज्ञ अब खोज कर रहे हैं कि वेनिस को कैसे बचाया जाए। समुद्र के पानी को रोकने के लिए अरबों रुपया लगा कर MOSE बैरीअर का निर्माण किया गया है। लेकिन फिर भी आए-दिन वेनिस को बाढ़ की समस्या से जूझना पड़ता है। वहाँ के लोग आस्तिक ईसाई हैं, अन्य कई धर्मों के लोग भी बाहर से आकर वहाँ बसे हुए हैं। इसका समाधान भगवान करेगा या विज्ञान, यह तो वक्त ही बताएगा।……जारी….प्रत्येक रविवार। वरिष्ठ पत्रकार संपादक अशोक माथुर की कलम से।


Share This News