






Thar पोस्ट (जितेंद्र व्यास)। बीकानेर संभाग की सत्य व दिलचस्प घटना। आज दशहरा पर विशेष आलेख। बीकानेर संभाग में रामलीला का मंचन हमेशा से ही आस्था और भक्ति का केंद्र रहा है। बीकानेर, श्रीगंगानगर, सूरतगढ़, हनुमानगढ़ और चूरू जैसे क्षेत्रों में रामलीला के मंचन को देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक उमड़ते हैं। समय के साथ मंचन में इजाफा हुआ है। लेकिन बीकानेर के कलाकारों से जुड़ी तीन दशक पुरानी एक ऐसी अनोखी घटना है, जिसकी चर्चा आज भी बेहद उत्सुकता और हंसी-मजाक के साथ करते हैं। आखिर क्या हुआ था उस दिन – विस्तार से जाने












उड़न खटोले और तारों के जरिए दिया जाता था जीवंत रूप
सूरतगढ़ में आयोजित होने वाली रामलीला अपने समय में काफी प्रसिद्ध थी। इसका मुख्य कारण था इसका बेहतरीन और तकनीकी प्रस्तुतीकरण। दृश्य को जीवंत बनाने के लिए बिजली के मोटे तारों, लोहे की गिरारी और कृत्रिम विमान (उड़न खटोले) का इस्तेमाल किया जाता था।रेलवे वर्कशॉप में काम करने वाले बीकानेर के कलाकार धूड़दास स्वामी अपने तबादले के कारण सूरतगढ़ में थे और अच्छी कद-काठी होने के कारण वे वहां रावण का किरदार निभाया करते थे।
सीता हरण के दौरान बिगड़ा संतुलन
घटना वाले दिन रामलीला के मैदान में दर्शकों की भारी भीड़ थी, जिसमें एक तरफ बड़ी संख्या में महिलाएं बैठी थीं। मंचन के दौरान सीता हरण का दृश्य चल रहा था। समानांतर तारों की व्यवस्था की गई थी—एक तार पर रावण और सीताजी का विमान तथा दूसरे तार पर गरुड़ बने पात्र को उड़ना था। जैसे ही रावण (धूड़दास स्वामी) सीताजी को उठाकर विमान में बैठकर आकाश की ओर उड़ा, दर्शक भाव-विभोर हो गए। रात के अंधेरे में विमान दर्शकों के ऊपर से गुजर रहा था, लेकिन तारों के संयोजन में आई तकनीकी खराबी के कारण विमान अचानक दर्शकों के पास नीचे झूल सा गया। और फिर-:
महिलाओं ने चप्पलों से कर दी ‘रावण’ की पिटाई
विमान नीचे आते ही भावुक हो चुकी महिलाओं ने रावण को बीच में ही घेर लिया। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, महिलाओं ने सीता हरण से आक्रोशित होकर एक साथ चप्पलों से रावण (कलाकार) की पिटाई शुरू कर दी। इस अचानक हुए हमले में रावण का मुकुट नीचे गिर गया और उसकी पोशाक भी फट गई। देखते ही देखते मैदान में हंगामा खड़ा हो गया। वहीं दूसरी तरफ, रावण से युद्ध करने के लिए हवा में उड़ने का इंतजार कर रहा ‘गरुड़’ बना पात्र अपनी बारी का इंतजार ही करता रह गया।बीकानेर के कलाकारों का यह अनोखा और मनोरंजक प्रसंग आज तीन दशक बाद भी बीकानेर और सूरतगढ़ के कला जगत में बड़े चाव से याद किया जाता है।
