FB IMG 1786264053997 यूरोप की यात्रा में इस बार...इमारतों में लकड़ी का बेमिसाल काम व फोल्डिंग साइकल व सम्मान Rajasthan News Portal पर्यटन
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Thar पोस्ट न्यूज। रात्रि बीतने के बाद चाय की मेज़ पर अलसाए हुए हम सोच रहे थे कि आज फ्रीबुर्ग शहर में ही इधर-उधर घूमा जाए। जैसा कि पहले भी बताया, फ्रीबुर्ग का अर्थ- आज़ाद दुर्ग। सैंकड़ों सालों से यहाँ के लोगों और सरकार ने किसी से कोई अशांति या लड़ाई नहीं की। ऐसा तभी हो सकता है जब हम एक दूसरे के वज़ूद व स्वतंत्रता को खुले दिमाग़ से स्वीकारें व उसका स्वागत भी करें। यह एक व्यवहार की बात है कि हमारे दोस्त और दुश्मन बदल सकते हैं लेकिन पड़ौसी नहीं। पड़ौसी की बगिया में खिलते हुए फूल देख कर यदि हम खुश होते हैं, तो ये जीवन जीने का अन्दाज़ बेहतरीन है।

फ्रीबुर्ग व यूरोप के अन्य शहरों में सार्वजनिक यातायात का प्रयोग कर और पैदल चल कर शहर को पढ़ने की कोशिश करना सबसे उम्दा तरीक़ा है। हम बस स्टैंड पर पहुँच गए। बिजली से चलने वाली बस ठीक टाइम पर हमारे सामने खड़ी थी। वहाँ खड़े सभी लोग बिना धक्का-मुक्की के बस में सवार हो गए। आरामदायक सीटों पर बैठ कार अंदर बाहर झाँकते हुए हम आगे बढ़ निकले। मेरी नज़र तो किसी न किसी कमी को ढूँढ रही थी। हमें जहाँ जाना था, हम वहाँ पहुँचे। सड़कों व फ़ुटपाथ पर न तो कचरा मिला, न कोई हंगामा देखने मिला। हम पुराने शहर की ओर पैदल चल निकले। अदिति बड़ी होशियारी से हमें पदयात्री बना रही थी। पुराने शहर की ऊँची मीनारें, भवनों पर खड़ी नक़्क़ाशी, सभी कुछ उत्साहवर्धक था। मुख्य मार्ग पर साइकल चलाते हुए लोग व हँसते-खेलते बच्चे देखते-देखते हम चौराहे पर आ पहुँचे। वहाँ एक वैन खड़ी थी जिस पर भारत-इंडिया लिखा हुआ था। इस वैन के ज़रिए एक ओपन-एअर रेस्टोरेंट चलाया जाता है। वहाँ चहल-पहल थी पर शांति भी थी।

एक पुलनुमा मार्ग पर हमने नीचे झाँक कर पुराने शहर, नदी, पत्थर के पुल व बसावट को देखा। एक घाटीनुमा जगह से निकालने पर हम एक पुराने और मशहूर कैफ़े में कॉफ़ी पीने चले गए। इस भवन के पीछे से नदी घाटी का खूबसूरत नज़ारा था। हरियाली व पेड़ों से टकराकर आने वाली हवा उन्माद पैदा करने वाली थी। इस कैफ़े में बहुत लोग आ रहे थे और उनका बंदोबस्त भी बहुत अच्छा था। वे अपने ग्राहकों को मुस्कुराकर व अभिवादन के साथ सर्विस दे रहे थे। काफ़ी देर बैठे रहकर जो नयन सुख मिला, वो आँखों के साथ साथ दिमाग़ पर भी असर डाल रहा था। पर अब हमें आगे चलना था। एक और पुल पार कर के हमने पुनः वापसी की बस पकड़ी।

इन सबके बीच फ्रीबुर्ग की पुरानी बसावट और उसकी मज़बूती को देखने व समझने का अवसर मिला। पुरानी इमारतों की छतों और दीवारों में लकड़ी का बेहतरीन उपयोग किया गया है। पुल और कुछ इमारतों ने तो सम्भवतया विश्व युद्ध के नज़ारे भी देखे होंगे। जहाँ से हम बस पकड़ रहे थे, वहाँ भी हरियाली का विशेष नज़ारा था। आबादी के बीच-बीच में जंगलों के रहने से परिदों को भी बसने की जगह मिलती है। पेड़ों पर रेंगती हुई छिपकलियाँ व कीट-पतंगे अपने अस्तित्व को वहाँ बचाए हुए हैं। जीव-जंतुओं और वनस्पति के साथ आदमी ने जो तालमेल सीखा है, उसकी ज़रूरत पूरी दुनिया को है।

फ़्रांस से अदिति के मित्र निहार को आना था। गणित में पीएचडी कर चुका यह नौजवान हमारी दिमाग़ी उलझनों को सुलझाता था, जैसे वह गणित के सवालों का हल ढूँढता हो। सिटी सेंटर होती हुई हमारी बस आगे बढ़ रही थी। रेल्वे स्टेशन पर ही एक छोटी सी साइकल पर हमें निहार दिखाई दे गया। ऊँचे-नीचे व चढ़ाईदार मार्ग पर वह पूरे जोश व उमंग से हमारी बस का मुक़ाबला कर रहा था। हम बस से पहुँचे और वो साइकल से। विज्ञान ने क्या कमाल किया है। साइकल फ़ोल्ड हो जाती है और यह फ़ोल्डिंग साइकल आराम से ट्रेन, बस, कार या किसी भी वाहन में ले जाई जा सकती है। इसका पृथक से किराया नहीं देना पड़ता।

पर्यावरण के लिए सजग वहाँ की व्यवस्था साइकल को नम्बर एक पर रखती है। साइकल के लिए पृथक से रास्ता होता है। साइकल के आने पर सबको उसे प्राथमिकता देनी होती है। इस प्रकार वहाँ की जीवनशैली में बड़ा, छोटा, ऊँचा व नीचा की पहचान लुप्त हो गई है। डॉ. निहार जैसे गणितज्ञ अगर साइकल पर दिख जाएँ, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। किसी कॉरपोरेट के सीईओ, प्रशासनिक अधिकारी अगर वहाँ साइकल चलाता हुआ मिले, तो हमारे जैसे तीसरी दुनिया के लोगों को उनकी ख़ुशहाली व स्वास्थ्य का राज़ समझ लेना चाहिए। खूब सारे लोग पैदल चलते हैं या दौड़ते हैं। इससे उनका स्टेटस ख़राब नहीं होता। तभी तो साँस लेने के लिए शुद्ध वायुमंडल मिलता है।

दिन छिपते-छिपते हम घर पहुँच गए। लेकिन डॉ. निहार का क्या करें। हम तो गणित में फिसड्डी थे और हैं। निहार को निहार सकते थे लेकिन बोलते वक्त गणित की बात से बचते हुए बोलते थे। निहार के लिखे पेपर, थीसिस और उसके काम को देखा। 100 में से कितने अंक दिए जाएँ, यह तो बहुत मुश्किल काम था। गणित में हम तो ज़ीरो बट्टा ज़ीरो हैं और हमें समय बिताना था पीएचडी धारक विद्वान के साथ। हमने निहार को खींच ही लिया देश, दुनिया, राजनीति और व्यवस्था से जुड़ी बातों पर। इन विषयों पर भी उसकी निपुणता देखकर ऐसा लगा कि वह कोई रट्टू-तोता नहीं है, उसकी पढ़ाई लिखाई वर्तमान और भविष्य की दुनिया की बेहतरी के लिए कई रास्ते खोल सकती है। खाने-पीने व बातें करने के बाद हम स्वप्नों की दुनिया में चले गए। जारी हर रविवार….वरिष्ठ पत्रकार अशोक माथुर की कलम से।


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