






Thar पोस्ट। इटली की लम्बी यात्रा से थक कर अब हमें 2 दिन स्विट्ज़रलैंड में घर पर ही विश्राम करना था। शारीरिक विश्राम था लेकिन चिंतन और आपसी विमर्श ज़ारी था। हम चाहते तो ये हैं कि पूरी दुनिया को एकजुट करें, लड़ाइयाँ ख़त्म हों। सह-अस्तित्व को इंसान अपनी संस्कृति बनाए। इंसान प्रकृति का हिस्सा है, मालिक बनने की कोशिश न करे। सब जीव-जंतु, पेड़-पौधे, नदी-नाले और पहाड़, समुद्र और आकाश, इनका सह-जीवन ही प्रत्येक प्राणी का जीवन है। स्विट्ज़रलैंड की धरती पर ऐसा कुछ-कुछ हम महसूस भी कर रहे थे। विज्ञान के ज़रिए प्रमाणित तौर पर वहाँ के लोग पाखंड और अंधविश्वास को नकार देते हैं। भूत-प्रेत, जादू-टोना से लेकर ईश्वर की सत्ता पर भी कुछ लोग प्रश्न चिह्न लगाते हुए खोज में जुट जाते हैं। खोज करने में कोई बुराई नहीं है। उसमें कुछ न कुछ नया तो मिलता ही है। पुराने कीमियागरों (रसायनशास्त्री) ने जीवन, आत्मा, मृत्यु और इसी प्रकार के मसलों पर कभी कुछ सोचा होगा और उनके द्वारा की जाने वाली खोजों से एक कोषीय अमीबा से लेकर ताज़ा तरीन कोरोना वायरस के बारे में पता चला। और अब चाँद तथा मंगल की धरती का ज्ञान आदमी को हो गया है। अगर वे अंधविश्वास करते रहे होते तो क्या मानव सभ्यता का विकास होता?

भारत में भी गुरुनानक ने कहा था- ‘पंचतत्वों का पुतला मैं’। बुद्ध और महावीर तो और भी आगे बढ़े। उनकी सोच व विचार को आस्था के साँचे में डाल कर विराम लगा दिया गया। यही वो कारण है कि यूरोपियन देशों में हर विचार पर भरपूर प्रश्न चिह्न व वाद-विवाद होता है। लैबोरेटरी में जहां पदार्थों व रसायनों पर शोध होता है, वहीं मानव के आचार-विचार व हरकतों पर भी चिंतन-मनन होता है। ये प्रवृत्ति फ़िलोसोफ़र (दार्शनिक) पैदा करती है, चिंतक पैदा करती है। वहाँ के लोगों को पता चल गया है कि सुकरात और गैलिलेओ जैसे लोगों को मारने से काम नहीं चलेगा अपितु उनके द्वारा सोची गई व कही गई बातों पर गौर करना होगा और आगे बढ़ना होगा। अब तो धर्म की सत्ता भी चिन्तनशील लोगों को आगे बढ़ने देती है। जिस इंसान ने चेचक का टीका बनाया था, अगर वो केवल गाय की पूजा करता रहता तो पूरी दुनिया चेचक से मुक्त नहीं होती। पोलियो का टीका नहीं होता तो विकलांगों की एक लम्बी क़तार होती। नए विचारों, चिंतन व वैज्ञानिक खोजें ही मानव को बचा सकती हैं, बशर्ते कि मानव सहजीवन को स्वीकार ले।
किताब में पढ़कर या फिर आजकल सोशल मीडिया में देख कर हम दूसरे लोगों का नज़रिया व अनुभव तो जान लेते हैं लेकिन इधर-उधर घूमने से जो कुछ वज़ूद में है, उसे देखने व समझने का मौक़ा मिलता है। फ्रीबुर्ग की जिस लोकैलिटी में हम रह रहे थे, उसके आसपास जाने से हमने वहाँ के सामाजिक जीवन को देखा। खेल के मैदान में बच्चे, बूढ़े व औरतें अपनी अपनी रुचि के खेल खेल रहे थे। कोई भेदभाव नहीं था। जाति, नस्ल, भाषा, धर्म, रंग यहाँ तक कि स्त्री व पुरुष सभी मिलजुल कर एक आनन्दमय वातावरण बना रहे थे। कुछ परिवार घर से खाना बना कर लाए थे, खा रहे थे, बतिया रहे थे। इन सबके बीच दौड़ने वाले, साइकल चलाने वाले निर्बाध गति से चल रहे थे। एक बेंच पर बैठकर मैं थकान मिटाने लगा तभी एक छोटे बच्चे ने फ़ुटबॉल को किक मारी। फ़ुटबॉल हवा में उछली और दूर तक गई। ऐसा लगा जैसे वह बच्चा कह रहा हो कि उठो और चलो।
अदिति ने कहा कि चलो, कुछ सामान ले आएँ। कहाँ चलें, दुकान तो दिखी नहीं और न ही पैकिंग मटीरीयल या अन्य प्रकार की गंदगी। 8-10 मंज़िल के एक फ़्लैट के नीचे साफ़-सुथरे परिवेश में एक स्टोर था। वहाँ पर भारतीय खान-पान का कुछ सामान उपलब्ध था। वह स्टोर श्रीलंका से आए एक प्रवासी भाई चलाते हैं। अदिति ने आवश्यकता का सामान लिया और कार्ड स्वाइप करके भुगतान कर दिया। हमें लगा कि हज़ारों किमी दूर भी कोई दिल के क़रीब बसा हुआ है। मैं सोच रहा था कि कोई मिल गया। मुस्कुराहट और ख़ुशी के साथ हम घर की ओर चल दिए। घर में खाना-पीना और चर्चा करना तथा सोशल मीडिया पर ताज़ा-तरीन मुद्दों पर कुछ देखने व सुनने का क्रम चलता रहा। भारत के चुनावों पर चर्चा होती रही। ऐसे ही सोचते, विचारते, खाते-पीते, मौसम का आनंद लेते हुए हमारा एक और दिन निकल गया।…..जारी हर रविवार….
