IMG 20260614 083231 गजब का अनुशासन: यूरोप की यात्रा 5 -ये पीसा की मीनार गिरती क्यों नहीं ? Rajasthan News Portal पर्यटन, देश
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अगले दिन हम पीसा की मीनार को देखने के लिए रवाना हो गए। रोमन सभ्यता के विकास व पतन और संघर्ष के अजीबो-गरीब दौर से गुजरते हुए मानव सभ्यता आज की स्थिति में आई है। इटली की राजधानी रोम है और उसके पास वैटिकन सिटी नामक अत्यंत छोटा देश है जहाँ सबसे बड़ा चर्च है। चर्च में अपार शक्तिशाली पोप है, ईसाइयों की इन में बड़ी आस्था है। अदृश्य को दृश्यित कर विभिन्न धर्मों के पुजारी और महंत कमाल का काम करते हैं। उनकी सारी सत्ता आस्था और विश्वास पर टिकी होती है। शासक वर्ग भी उनके आगे काँपता देखा गया है। लेकिन इसी इंसानी दुनिया में सत्यशोधक भी होते हैं। वे सच ढूँढ लेते हैं। वह तर्क विज्ञान के आधार पर टिका हुआ होता है न कि आस्था व भावना के आधार पर। सैंकड़ों साल पहले एक आदमी ने खड़े होकर कहा कि धरती सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। उसने दिन और रात के रहस्य पर पड़े पर्दे को हटा दिया। लेकिन इस सामान्य आदमी गैलिलेओ की बात से तत्कालीन चर्च और पादरियों का पाखंड बेनक़ाब हो गया था। वे सच्चाई से काँपने लगे। गैलिलेओ को जेल और फिर मौत मिली। उनकी मौत के बाद भी सच्चाई सूरज की मानिंद प्रकाश बिखेरती गई। चिंतन और शोध करने वाले लोगों ने और भी नई-नई बातें उजागर की। दुनिया में नई बात, नई रोशनी अंधविश्वासों और पाखंड के अंधेरे को चीर कर सामान्य लोगों तक पहुँचने लगी। हमारे यहाँ भी अंधविश्वास ने हमें बचपन से सिखाया कि धरती शेषनाग के फन, गाय के सींग, वराह अवतार के दाँतो पर टिकी है। ये जब हिलते हैं, तब धरती हिलती है और भूकम्प आते हैं। इस प्रकार के अंधविश्वासों से लड़ने के लिए भारत में भी अपने गैलिलेओ (वैज्ञानिकों) की ज़रूरत है।

चर्च ने माफ़ी माँगी और गैलिलेओ को सही ठहराया। इस ऐतिहासिक घटना के कारण ऊँचे ऊँचे चर्चों को निहारने की मंशा हमारे मन में वैसे भी नहीं थी। ग़ुलामों और आम लोगों की बेगार और शोषण पर ही तो वैभव की अट्टालिकाएँ टिकी होती हैं। इटली में विश्व के सात आश्चर्यों में से एक रही पीसा की मीनार हमें पुकार रही थी। हाई-वे के बीचों बीच बने एक मिड-वे में हमने लंच किया। हमारे रेस्टोरेंट के नीचे से बड़े-छोटे वाहन निकल रहे थे। पीसा शहर में जाने की बजाय हम सीधे पीसा की मीनार पर पहुँच गए। स्कूल में इसके बारे में पढ़ा था। उसकी फोटुएँ भी देखी थी। अब हम प्रत्यक्ष मीनार के नीचे थे। मीनार एक तरफ़ से झुकी हुई है। फ़ाउंडेशन में हुए किसी परिवर्तन की वजह से ऐसा हुआ है। सिविल एंजिनीरिंग के युवाओं के लिए यह शोध का एक अच्छा स्थान है। कौनसा ऐसा मसाला लगाया कि मीनार गिरती नहीं है।

पर्यटकों की भीड़ थी। अब तो हर पर्यटक फोटोग्राफर है। लोग ऐसा पोज़ बना रहे थे, जैसे वो मीनार को सहारा दे रहे हों। फ़ोटो तो ऐसी आ ही जाती है लेकिन एक सुंदर ख़ुशफ़हमी अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए होती है। मीनार के आस-पास म्यूज़ीयम, चर्च व रेस्टोरेंट हैं। एक रेस्टोरेंट में हमने भी नाश्ता किया और एक विशालकाय शेर की मानिंद एक कुत्ते को भी देखा। वो बड़ी शालीनता के साथ काउंटर के पास बैठा था। हमारे दिमाग़ में तो जानवर को देख डर आ ही जाता है। लेकिन कुत्ता ऐसे बैठा था जैसे वो पढ़ा-लिखा हो। पीसा की मीनार से हमें रात्रि विश्राम के लिए किसी होम-स्टे में जाना था। एक छोटे क़स्बे में रात्रि-विश्राम का बंदोबस्त था। रात होते-होते हम वहाँ पहुँचे।

दरवाज़े पर कोई चौकीदार नहीं था, निर्धारित स्थान से चाबी उठाकर एक जगह लगाए रखने पर दरवाज़ा अपने आप खुलता जा रहा था, ऐसा तो हमने फ़िल्मों में देखा था। गाड़ी अंदर ले जाकर पार्किंग में लगाई गई। झिरमिर बारिश के बीच अब हम अपने कमरे में थे। कमरे में रखी मेज़ पर खाने-पीने का सामान हमारे स्वागत के लिए रखा था। सफ़र काटने के बाद कुछ गर्म पीने की इच्छा होती है, हमने चाय बनाकर पी और कुछ खाया भी। कमरे के अंदर सर्द वातावरण तो नहीं था, कमरा गर्म रखने का माकूल प्रबंध था। फिर भी हमने रज़ाइयाँ ले कर कमरे के बाहर झाँका। हरियाली और शानदार माहौल के बीच हम सोने लगे। यहाँ हमसे न तो किसी ने कुछ पूछा, न ही कोई दस्तावेज़ देखे, न ही कोई रजिस्टर भरवाया। सुबह हमें स्विट्ज़रलैंड वापस जाना ही था।

सुबह होने पर पहाड़ की हरियाली और हिलौरे लेती हवा हमें आकर्षित कर रही थी। दरवाज़े, खिड़कियाँ खोलकर हमने बाहर बरामदे में सुबह का आनंद लिया। तैयार हो कर मुख्य भवन में पहुँचे। एक महिला हमारे स्वागत में वहाँ मौजूद थी, वह घर की मालकिन थी। अभिवादन के बाद हम कुर्सियों पर बैठ गए और सबसे पहले ताज़ा संतरे का जूस पिया। उस महिला ने हमें और जूस पीने का ऑफ़र किया। ब्रेकफ़ास्ट में तरह-तरह की ब्रेड, चीज़, बटर, फल आदि बहुत कुछ था। जितना मर्ज़ी, उतना खाओ। भरपेट नाश्ता करने के बाद उस महिला ने स्थानीय भाषा में ही हमसे कुछ और लेने को कहा। पेड़ों पर लटके हुए फल हमें आकर्षित कर रहे थे। उनसे जब हमने फल लेने को पूछा तो उन्होंने हमें तोड़ने की इजाज़त दे दी। हमने ऐसा किया भी। कमरे में वापस जा कर हम कमरा ख़ाली करने की तैयारी में जुट गए। हमारे स्वागत हेतु वहाँ रात्रि को मेज़ पर जो वाइन कि बोतल, सलामी, गार्लिक ब्रेड, चॉकलेट आदि रखे थे, ये सब हमने रास्ते में खाने के लिए रख लिए। वाइन कि बोतल वहाँ की मेहमान नवाज़ी की परम्परा है। गाँव-गाँव में बनती भी बहुत है। गाड़ी में सामान रखने के बाद गृह-स्वामिनी को टाटा-बाय-बाय तो कहना ही था। वहाँ एक अकेली महिला उस जंगल व पहाड़ों के बीच इतना सुंदर मन लुभावने होम-स्टे का प्रबंध निर्भीक हो कर कर सकती है। गाड़ी आगे बढ़ी। फार्म हाउस का दरवाज़ा अपने आप खुल गया। छोटे और संकरे मार्ग पार करके हम हाई-वे पर कार दौड़ाने लगे। वरिष्ठ पत्रकार अशोक माथुर की कलम से जारी हर रविवार…..


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