ताजा खबरे
पंचायत राज आम चुनाव : अनुपस्थित 34 कार्मिकों को नोटिस, होगी निलंबन की कार्यवाहीशारदीय नवरात्रा कल से, शुभ मुहूर्त व अन्यमारुती उद्योग को लगातार पांचवी बार मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मानशारदीय नवरात्रा में लगातार 82वें साल में गोकुल सर्कल पर होगा अखंड हरि कीर्तनप्रदर्शन : दिल्ली में क़िलाबन्दी ? सभी बॉर्डर सील‘पंचायत चुनाव जीतने पर कुंवारे युवकों की शादी कराउंगी’ : वोट दो-दुल्हन लो’अमेरिका में आरोपी को मौत की सजा सुनाई, लाइव दिखाने पर छिड़ी बहसडूंगर कॉलेज के शोधार्थी दीपक यादव को पीएच.डीआरोपी की गिरफ्तारी व निष्पक्ष जांच के आश्वासन के बाद धरना खत्म, मृतक का किया अंतिम संस्कारहनुमानगढ़ में पंचायत एवं जिला परिषद चुनावों को लेकर भाजपा ने तेज की तैयारियां
IMG 20231009 150729 चुनाव : कुछ अलग ही थी चुनावी रंगत, यह क्या था -एक कचौरी-दो समौसा ? Rajasthan News Portal देश
Share This News

Thar पोस्ट, न्यूज। कुछ अलग ही हुआ करती थी चुनाव की रंगत। आज से दो तीन दशक पूर्व तक राजस्थान में चुनाव की रंगत कुछ और ही थी। संसाधन बहुत सीमित थे, लेकिन चुनाव की रंगत व इसके प्रति उत्साह देखने लायक़ था। नेताओं को लेकर गाने नारे तैयार होते थे तो कई तुकबंदियां भी माहौल में रंगत घोल देती थी। जैसे एक नारा चला था- एक कचौरी-दो समोसा श्योपत का है नहीं भरोसा। यह नारा चल पड़ा था। कामरेड श्योपत सिंह के लिए यह नारा सटोरियों ने खूब चलाया। जीत के हिसाब से भाव सही नहीं होने पर भी श्योपत जीत गए। एक अलग ही माहौल था। इसी तरह एक गाने की तर्ज में लोकप्रिय महबूब अली का खूब स्वागत होता था। – बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है। महबूबजी साईकल वाले मंत्री के तौर पर भी लोकप्रिय हुए, उनकी एक खास पहचान बनी। अनेक नारे थे जिससे एक अलग ही माहौल बनता था। जैसे कि मैंने बताया कि संसाधन सीमित थे। तांगा गाड़ी व ऑटो पर नेता व पार्टियां प्रचार करवाती थी। इसका भी अपना मज़ा था। जब तांगे पर प्रचार काँग्रेस का चलता और वह ऐसे इलाके में पहुंच जाता जहाँ बीजेपी के मतदाता अधिक होते थे तो एक ही नारा गूंजता था- कूडो कूडो। यदि तांगे या टैक्सी से प्रचार बीजेपी का होता और वह ऐसे इलाके में पहुंच जाता जहाँ कांग्रेस के वोट अधिक थे तो वहां भी यही नारा होता था। स्थानीय लोग इसे छोडडा लेना कहकर तांगे व टैक्सी पर प्रचारक को परेशान करते थे। इन स्थितियों को भांपते हुए लोकप्रिय प्रचारक कैलाशजी तो एक अलग ही अंदाज़ में प्रचार करते थे। उनकी आवाज -मम्मी मम्मी – क्या है बेटा। सभी लोगों का ध्यान खींचती थी। आज भले ही चुनाव हाइटेक अंदाज़ में होने लगा है। वोटर्स भी साइलेंट मोड पर रहते है। लेकिन पहले कुछ अलग था। चुनाव की रंगत से माहौल महीनों पहले ही रंग जाता था। गली मौहल्ले व कॉलोनियां भी पार्टी की फरी, बैनर व झंडों से रंग जाती थी। पुरुषों की शर्ट व महिलाओं की साड़ी पर पार्टी के बिल्ले स्टीकर होते थे। लोग यह देखने निकलते थे कि किस मोहल्ले में किस पार्टी को अधिक वोट पड़ेंगे। हर मोहल्ले में पार्टियों के कार्यालय खुलते थे जहाँ कार्यकर्ता अपने नेता को पार्टी को जितवाने के लिए लगे रहते थे। कई बार दो दलों के कार्यकर्ता भी आपस मे भिड़ जाते थे। अब ऐसा नहीं होता। माहौल बदल चुका है। कार्यकर्ता भी जागरूक हो चुके है शायद उन्हें हिन्दू मुस्लिम राजनीति, वोट की राजनीति, वोटों का ध्रुवीकरण, वोट धन बल, विवाह तथा संबधों की राजनीति आदि आदि बातें समझ मे आने लगी है।


Share This News