







Thar पोस्ट न्यूज। देश मे बढ़ते यौन उत्पीड़न के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने जजों के लिए संवेदनशीलता संबंधी नई गाइडलाइन जारी की है। हाई कोर्ट के कुछ जजों द्वारा की गई टिप्पणियों से चिंतित सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) की सहायता से एक बड़ा कदम उठाया है. अदालत ने न्यायाधीशों के संवेदनशीलता प्रशिक्षण के लिए दिशा-निर्देशों का एक व्यापक सेट अपनाया है, ताकि उनके फैसलों में असावधान या असंवेदनशील टिप्पणियों से बचा जा सके. क्यों कि इस तरह की टिप्पणियों से पीड़िताओं को मानसिक आघात पहुंचता है.

ये है नई गाइडलाइन
सुप्रीम कोर्ट इससे पहले भी कह चुका है कि इस तरह की टिप्पणियां ‘पीड़िता को दोषी ठहराने’ के समान हैं और पितृसत्तात्मक रूढ़ियों को मजबूत करती हैं. NJA की ओर से तैयार इन दिशा-निर्देशों में जजों से यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान लैंगिक रूप से संवेदनशील, पीड़ित-केंद्रित भाषा अपनाने और अदालत में सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने इन दिशा-निर्देशों को अपनाते हुए अपनी वेबसाइट पर भी अपलोड कर दिया है. NJA की समिति ने मुख्य रूप से कहा है कि जज पीड़िता को दोषी ठहराने वाली भाषा और पितृसत्तात्मक रूढ़ियों से बचें.
जैसे उदाहरण के लिए इन शब्दों से बचे
Judgments and Gender: Sensitivity and Compassion in Writing Judgments’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में ऐसे ‘समस्याग्रस्त वाक्यांशों’ की सूची दी गई है, जिनका जज अक्सर प्रयोग करते हैं. साथ ही उनके स्थान पर कानूनी रूप से उपयुक्त और तटस्थ विकल्प भी सुझाए गए हैं इसके अनुसार
- ‘महिला का शरीर खेल का मैदान’ कहने के बजाय “शिकायतकर्ता की शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन” कहा जाए ‘असहाय महिला’ के बजाय ‘शिकायतकर्ता’ कहा जाए.
- ‘लज्जा भंग’ के बजाय ‘यौन उत्पीड़न’ कहा जाए.
- ‘उसने अपनी पवित्रता/शील खो दी’ कहने के बजाय ‘ सरवाइवर की शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन हुआ’ कहा जाए.
- ‘वासना से प्रेरित’ के बजाय ‘यौन हिंसा’ शब्द का प्रयोग किया जाए
समिति ने राज्य न्यायिक अकादमियों की सहायता से देशभर के 125 ट्रायल कोर्ट के फैसलों का विश्लेषण करने के बाद ये सिफारिशें तैयार की हैं. अध्ययन में पाया गया कि पीड़ितों, गवाहों और अन्य कमजोर वर्गों के प्रति न्यायाधीशों के दृष्टिकोण और संवेदनशीलता का स्तर मिला-जुला रहा.समिति ने कहा कि न्यायिक भाषा में संवेदनशीलता केवल शिष्टाचार का विषय नहीं, बल्कि निष्पक्षता, गरिमा और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है. समिति ने इस बात पर भी जोर दिया कि जजों को रूढ़िवादी सोच या पीड़िता को दोषी ठहराने वाले सवाल पूछने से बचना चाहिए और पीड़ितों को आरोपी के आमने-सामने आने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए.
