





वरिष्ठ पत्रकार अशोक माथुर की कलम से


Thar पोस्ट। मैने जब पत्रकारिता की दुनिया मे कदम रखा तो पहले व्यक्तित्व थे अशोक माथुर जिनसे मेरा सामना हुआ। मुझे आज भी याद है जब उन्होंने मुझे एक विषय देकर खबर लिखने को कहा। उस दौर में कंप्यूटर पर खबरें नही लिखी जाती थी। मैने खबर लिखी तो वे बोले – मैं 10 नंबर देता हूँ। इसके बाद माथुर साहब से अनेक विषयों पर चर्चाएं होती रही। उनकी कमी हमेशा खलेगी। उन्होंने यूरोप के मुख्य देशों की यात्रा की। आज से उन्ही के शब्दों में श्रृंखला प्रकाशित की जा रही है। आज भाग एक। यूरोप की यात्रा श्री अशोक माथुर की जुबानी:
” पूरी दुनिया के बेहतरी, स्वास्थ्य, रोज़गार, शांति व जीवन से जुड़े हुए अनेकों मुद्दों पर शोध, चिंतन व विचार करके सरकारों व नागरिकों के लिए महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ और निर्देश जहाँ से ज़ारी होते हैं, उस धरती, स्विट्ज़रलैंड, को देखने और वहाँ की बसावट को समझने का अवसर हमें हमारी बेटी, अदिति के ज़रिए मिला जो वहाँ कार्यरत है। रवाना होने से पहले घबराहट थी, भाषा का संकट था, चलने-फिरने की मुश्किल थी, लेकिन स्विट्ज़रलैंड का आकर्षण भी अनुपम था। इंदिरा गांधी एअरपोर्ट, नई दिल्ली से सब सरकारी रस्में अदा कर स्विस एअरलाइन्स के ज़रिए हम ज़्यूरिक पहुँच गए। अदिति और उसकी सहेली पलक तक पहुँचने से पहले हमें पासपोर्ट चेकिंग, इमिग्रेशन, आदि करवाने पड़े। अंतर्राष्ट्रीय हवाई यात्रा से जुड़े प्रशासनिक कार्यों में मदद के लिए अदिति ने हमारे लिए व्हीलचेअर सर्विस बुक कर रखी थी। जो सहायिका हमें लेकर चल रही थी, उसका व्यवहार काफ़ी दोस्ताना था। हमारी भाषा व बोलियाँ अलग-अलग थीं, उसके बावज़ूद भी वो हमें समझ रही थी। कुर्सी पर बैठे-बैठे मुझे पुराने किलों में बने, विशेषकर जयपुर के आमेर में बनी भूल-भुलैया याद आ रही थी। आधुनिक यंत्रों व व्यवस्थाओं से लैस ज़्यूरिक का हवाई अड्डा भूल-भुलैया होते हुए भी सुविधाजनक था। एक लिफ़्ट से हमें नीचे ले जाया गया जहाँ मुस्कुराहट और गर्मजोशी के साथ इमिग्रेशन अधिकारी ने हमारे पासपोर्ट पर क्लीयरेंस का ठप्पा लगाते हुए भावपूर्ण अभिवादन किया। थोड़ी दूर चल कर एक लिफ़्ट से वापस ऊपर ले जाया गया जहाँ कन्वेअर बेल्ट पर यात्रियों का सामान आ रहा था। हम अपने सामान की पहचान करते उससे पूर्व ही व्हीलचेअर वाली सहायिका ने एक ट्रॉली लगा दी। हमने जैसे ही अपना बैगेज पहचाना, उसने व उसके साथी ने ख़ुशी ख़ुशी सामान उठा कर ट्रॉली में रख दिया। वे दोनों आपस में बहुत बातें कर रहे थे, जो हमारी समझ से परे थी, लेकिन एक बात समझ आ रही थी, हमारी मदद करते हुए वे अपने सहयोगी को कुछ समझा रही थी। उन दोनों को देखकर लम्बे-चौड़े एअरपोर्ट पर हमें न घबराहट हुई, न कोई चिंता। तक़रीबन सारा एअरपोर्ट पार कर जब हम बाहर आए, तो अदिति व उसकी सहेली पलक उत्साह से उछल पड़े और हमारी सहायिका ने हमसे पूछा – Your daughter? व अदिति से पूछा – Your parents? और हमें विदा कर दिया।
अब हम बच्चों के साथ थे। उन्होंने हमसे टॉयलेट जाने के लिए पूछा। हम एक आधुनिक टॉयलेट में फ़्रेश हुए और वे तुरंत हमें एअरपोर्ट के एक रेस्टोरेंट में ले गए। उन्होंने हमें गर्मागर्म कॉफ़ी व स्विट्ज़रलैंड/ फ़्रांस के नाश्ते की एक लोकप्रिय डिश क्रॉसों का नाश्ता करवाया। हम बीकानेर वालों को ऐसे समय कचौरी – समोसा याद आ ही जाता है।
एक सामान्य नागरिक के आत्म सम्मान पर बिना चोट किए और भाषा की असुविधा होते हुए भी जो व्यवहार हमारे साथ किया गया, उससे लगा कि स्विट्ज़रलैंड की धरा पर अतिथि देवो भव: व्यवहार रूप में लागू होता है। यह हमारा निजी अनुभव नहीं था, वहाँ जितने भी चहरे दिख रहे थे, वे खुश व मुस्कुराते हुए ही नज़र आ रहे थे। ज़्यूरिक के एअरपोर्ट से अन्य कई देशों के लोग भी हवाईजहाज़ पकड़ते हैं। आगे की यात्रा के लिए कौन, कैसे जाएगा, इसकी व्यवस्था अति-उत्तम थी।
‘हम लोग’ शब्द का उपयोग जब में करता हूँ, यह कोई घमंड और सामंती व्याकरण के लिए नहीं, अपितु हिंदी भाव में ‘मैं’ ‘हम’ में बदल जाता है। मैं और मेरी पत्नी बाला माथुर साथ होने पर ‘हम’ का सम्बोधन वाजिब है। सच तो यह है कि मेरे जैसा कमज़ोर आदमी बाला जैसी पत्नी के कारण दुनिया में अनेक जगह जा पाया और अब यूरोप की बारी थी। क्रमश : …..