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IMG 20260105 125139 ऊँट उत्सव : एक जुनून कैसे बना रंगीला उत्सव ? तब बीकानेर में पहली बार हुआ था फेस्टिवल भाग -1 Rajasthan News Portal पर्यटन
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Thar पोस्ट (जितेंद्र व्यास)। रेत के दूर तक फैले समुंदर के बीच बसे बीकानेर को ‘ऊंटों वाला देश’ प्राचीन समय में कहा जाता था। अमेरिका में जाया जन्मा ऊंट अब पश्चिमी राजस्थान के गावों की न केवल आजीविका की रीढ़ है बल्कि पडौसी देश से सुरक्षा की तय प्रथम पंक्ति में भी शामिल है। यह राजस्थान की अलहदा संस्कृति का अहम् हिस्सा भी है। ऊंट के सम्मान में सजदा करते हुए हर साल बीकानेर में ऊंट उत्सव का आयोजन होता है। इतिहास की बात करें तो बीकानेर में इसका आगाज भी दिलचस्प तरीके से हुआ। दरअसल वर्ष 1993 में बीकानेर के एक पर्यटन अधिकारी राजेंद्र सिंह शेखावत बजरंग धोरे पर हुए एक समारोह में मुख्य अतिथी थे। पूर्व विधायक नन्दलाल व्यास ने यह समारोह रखा था। यहाँ उनका ऊंट ‘काजलिया‘ गजब का थिरका। इसी दृश्य को जेहन में लिए राजेंद्र सिंह अपने पर्यटन कार्यालय पहुंचे। उन दिनों जूनागढ़ किले में पर्यटन कार्यालय हुआ करता था। सहायक निदेशक ने तुरंत योजना बनाकर राज्य सरकार को भेज दी। लेकिन सोचा गया कोई भी कार्य आसान नहीं होता। सरकार से जवाब मिला कि पर्यटन कैलेंडर के हिसाब से कोई भी महीना खाली नहीं है। जनवरी में तेज सर्दी के कारण कोई उत्सव संभव नहीं है। इस पर जीवटता के धनी राजेन्द्र सिंह ने जनवरी ही मांग लिया। कुछ बाधाओं के साथ 1994 में कतरियासर और डॉ करणी सिंह स्टेडियम में इसका आगाज हुआ। हालांकि तब इसका नाम कैमल फेस्टिवल नहीं था। आयोजन से शुरू से दिवंगत जगदीश पुरोहित खेमसा सहित अनेक लोग इससे जुड़ते गए। क्रमश:….


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