

Thar पोस्ट न्यूज। भारत के गुजरात राज्य के एक पायलट ने 150 से अधिक इजराइली नागरिकों यहूदियों की हवा में रक्षा कर इंसानियत की मिसाल पेश की। गुजरात के ही एक महाराजा हुए थे जिन्होंने इस धरती पर हज़ारों यहूदियों को शरण दी थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड यहूदियों पोलिश लोगो का देश हुआ करता था। जिसके आधे हिस्से पर जर्मनी व आधे पर सोवियत यूनियन ने कब्जा कर पोलिश लोगों को निर्दयता से मारना शुरू किया था। पहले बात करेंगे ताजा घटनाक्रम की।










फ्लाईदुबई की फ्लाइट में हाल ही में एक भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार द्वारा 174 लोगों की जान बचाने के अदम्य साहस और कर्तव्यनिष्ठा की सभी सराहना कर रहे हैं। सितंबर 2026 में दुबई से तेल अवीव (इज़राइल) जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट FZ1073 में उनके सह-पायलट (को-पायलट) ने कॉकपिट के अंदर उन पर चाकू से हमला कर दिया था और विमान को क्रैश करने की कोशिश की थी। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद कैप्टन स्मित मच्छर ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए न केवल हमलावर को काबू करने में मदद की, बल्कि 174 यात्रियों की जान बचाई। लेकिन इसके साथ इतिहास भी दोहराया गया है।
आजादी से पहले गुजरात में कच्छ के खाड़ी के दक्षिणी छोर पर एक सल्तनत हुआ करती थी, नाम था नवांनगर. यहां जडेजा राजपूतों का शासन था. आजादी के बाद ये भारतीय संघ का हिस्सा हो गया. और शहर का नाम पड़ गया जामनगर. इसी परिवार में साल 1895 में दिग्विजयसिंहजी का जन्म हुआ. लंदन में पढ़ाई के बाद वे 1919 में ब्रिटिश आर्मी में कमीशन हो गए. 1931 में कैप्टन के पद से रिटायर हुए. साल 1933 में जामसाहेब रतनसिंहजी की मौत के बाद वे नवांनगर रियासत के महाराजा बने. द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद उन्हें इम्पीरियल वॉर कैबिनेट का हिस्सा बनाया गया. कैबिनेट का हिस्सा रहते हुए महाराजा दिग्विजयसिंह को पोलिश पोलैंड के यहूदी रेफ्यूजियों की हालत का पता चला, जो तब दुनिया भर से मदद की गुहार लगा रहे थे. ऐसे मौके पर महाराजा ने उनकी तरफ मदद का हाथ बढ़ाया.
ब्रिटिश सरकार पोलिश रेफ्यूजियों के भारत आने को लेकर खुश नहीं थी. उनका भी कारण वही था. वो अपने सहयोगी स्टालिन को नाराज नहीं करना चाहते थे. लेकिन महाराजा इस बात पर अड़ गए. और सरकारी लाल फीताशाही को दरकिनार करते हुए 500 पोलिश रेफ्यूजियों को अपने यहां शरण दी. इनमें काफी संख्या में बच्चे थे. महाराजा दिग्विजयसिंह ने उनसे कहा,”नवांनगर की जनता मुझे बापू कहती है, आज से मैं तुम्हारा भी बापू हूं.”
ये वो दौर था जब भारत खुद युद्ध की मार झेल रहा था. इसके बावजूद भारत वो पहला देश बना जिसने पोलिश रेफ्यूजियों को अपने यहां शरण दी. महाराजा दिग्विजय सिंह ने बाकी रियासतों को भी मनाया. टाटा घराने और कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी की मदद से रेफ्यूजियों के लिए चंदा इकठ्ठा किया गया. 1942 से 1948 के बीच लगभग 6 हजार पोलिश रेफ्यूजियों को भारत में शरण दी गई. बालाचड़ी में इनके लिए पहला कैम्प बनाया गया. इसके अलावा एक कैम्प कोल्हापुर के नजदीक वालीवाड़े में बनाया गया.
दुनियाभर में जहां यहूदी रेफ्यूजियों को न्यूनतम आसरा दिया जाता था. वहीं भारतीय कैंप्स में रहने की सारी सुविधाएं थीं. बच्चों के लिए अलग कमरे, अलग बिस्तर, खाना, कपड़ा समेत चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध थीं. महाराजा दिग्विजय ने यहां बच्चों के पढ़ने का इंतज़ाम भी किया. इनके लिए पोलैंड से किताबें मंगवाईं ताकि वो अपनी भाषा में पढ़ सकें. इतना ही नहीं एक चर्च भी बनाया गया ताकि लोग अपने धार्मिक अनुष्ठान कर सकें। इससे पहले के घटनाक्रम के अनुसार सोवियत यूनियन ने उत्तरी ईरान पर भी कब्ज़ा कर लिया था. इसलिए इन्हें वहां से भी भागना पड़ा. कुछ महीने ईरान में रहने के बाद ये लोग अलग अलग देशों में गए. इन देशों के नाम थे- भारत, यूगांडा, केन्या, साउथ अफ्रीका, न्यूजीलैंड और मेक्सिको। इनमें अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन जैसे देशों का नाम नहीं है. कारण- अमेरिका अपने सहयोगी स्टालिन को नाराज नहीं करना चाहता था. इसलिए जो पोलिश रेफ्यूजी अमेरिका पहुंचे, उन्हें मेक्सिको भेज दिया गया। ईरान से बचते हुए वे भारत के गुजरात पहुंचे थे। वर्तमान में यहूदियों की सर्वाधिक संख्या इजराइल व अमेरिका में है। इजराइल एक छोटा देश है लेकिन तकनीक व ज्ञान के मामले में सभी देशों पर भारी है। लेकिन एक पहलू ये भी:
राजस्थान के पर्यटन गांव पुष्कर में सर्वाधिक इजरायली आते हैं। जहां वे समूहों में पार्टी मौज मस्ती करते है। उनके कैम्प भी बने हुए हैं। अनेक कैम्प्स के बाहर बोर्ड टंगा रहता है जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा होता है। INDIANS ARE NOT ALLOWED
