






Thar पोस्ट न्यूज। दुःखों से निवृत्ति एवं सुखों की प्राप्ति के उपाय संवाद कार्यक्रम की दूसरे दिन होटल पाणिग्रहण में में स्वामी जी ने दर्शकों से संवाद करते हुए बताया की जीवन एक परीक्षा कक्षा की तरह हैं जिसमें अनेको विद्यार्थी परीक्षा दे रहे होते हैं तथा ईश्वर रूपी परीक्षक उनके मध्य विचारण कर रहा होता है विद्यार्थी के गलत उत्तर लिखने पर भी परीक्षा के समय वह उसमें सुधार नहीं करवा सकता।परीक्षा समाप्त होने के पश्चात ही गलत और सही का निर्णय होता है अर्थात कर्मों के अनुसार फल की प्राप्ति होती है। जीवन के सार्वभौमिक सिद्धांत के तीन मुख्य बिंदु है कि समस्या क्या है, समस्या का कारण क्या है तथा कारण का निवारण क्या है।यदि इन बिंदुओं के अनुसार कार्य को संपन्न किया जाए तो समस्या का स्वयं ही निवारण हो जाएगा ।

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में दुःख आना स्वाभाविक है इसका सबसे बड़ा कारण इच्छाओं की पूर्ति ना होना अथवा ज्यादा इच्छाओं का होना है ।जैसे-जैसे इच्छाएं पूरी होती जाती हैं इच्छाओं में बढ़ोतरी होती जाती , हम अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण कर दुःखों को नियंत्रित कर सकते हैं। दूसरों पर आधारित इच्छाएं भी दुःख का कारण होती हैं उनके द्वारा हमारी इच्छाओं के अनुरूप कार्य नहीं करने से हमें दुःख का अनुभव होता है अतः अन्य से अपेक्षा कम रखें तथा कोई कार्य पूर्ण नहीं होने पर मन में कहे कोई बात नहीं।आपको गुस्सा नहीं आएगा अन्य से अपेक्षा करते समय हां या ना के लिए सदैव तैयार रहे, दोनों स्थितियां में सहज रहें।जाने या अनजाने में सभी से गलतियां होती हैं एकमात्र ईश्वर ही ऐसा है जो गलती नहीं करता।
सहनशीलता सुंदर आभूषण है अधिक से कम नुकसान भला है यही सकारात्मक सोच जीवन में सदैव होनी चाहिए।आपने अपने सामर्थ्य अनुसार अपनी पूरी शक्ति लगाकर प्रदान किए गए कार्य को संपन्न किया परंतु सामने वाला व्यक्ति अपनी समझ के अनुसार उसका आकलन नहीं कर पाया उसका मूल्य प्रदान नहीं कर पाया तो निराश ना हो आप उसे व्यक्ति या संस्था के लिए कार्य ना करके ईश्वर के प्रदान किया गए कार्य को कर रहे हैं प्रतिफल समय आने पर ईश्वर प्रदान करेगा।ईश्वर के प्रति अपने मन में सदैव विश्वास बनाए रखें आपको निराश नहीं मिलेगी समय आने पर आपको सफलता अवश्य मिलेगा प्रकृति तथा कानून के अनुसार कार्य ना कर अपनी मनमानी करना स्वच्छंदता है जबकि कानून सम्मत कार्य करना स्वतंत्रता है।व्यक्ति अपनी अच्छाइयों का फल तो तुरंत चाहता है परंतु बुराइयों का फल प्राप्त करने के लिए तैयार नहीं होता पूर्ण । समय आने पर दोनों प्रकार के फल स्वयं ही प्राप्त हो जाते हैं।
संवाद प्रेषक
रविंद्र भटनागर
