





Thar पोस्ट। यूरोप इन दिनों उबल रहा है। सर्दी व बर्फबारी से बचाव के लिए किए गए जतन जानलेवा साबित हो रहे है। अकेले फ्रांस में पिछले हफ्ते भीषण गर्मी के कारण करीब 1,000 लोगों की मौतें हो चुकी हैं। इस देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी के अनुसार पेरिस क्षेत्र में घरों के अंदर होने वाली मौतों में भारी उछाल आया है। दो दिनों में मौत का आंकड़ा 1,400 से ऊपर पहुंच गया है। गर्मी से पहले यहां हर दिन औसतन 900 से 1,000 मौतें होती थीं। मृतकों में 85 प्रतिशत लोग 65 साल या उससे अधिक उम्र के थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन गया है। यह वैश्विक औसत से दोगुनी रफ्तार से गर्म हो रहा है।

उन्होंने बताया कि फिलहाल 15 करोड़ लोग भीषण गर्मी में रहने के लिए मजबूर हैं। स्कूलों को बंद करना पड़ा है और बिजली ग्रिड फेल हो रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के बिना इतनी भीषण गर्मी और उमस मुमकिन नहीं थी। गर्मी का असर सड़कों और ट्रेनों पर भी पड़ा है। सड़कों की कंक्रीट की सतह टूट रही है। लीपजिग शहर में पटरियों के पिघलने के कारण ट्राम सेवा बंद करनी पड़ी। बर्लिन में पुलिस ने लोगों को ठंडक देने के लिए पानी की बौछारों (वॉटर कैनन) का इस्तेमाल किया। वहीं हैम्बर्ग से प्राग जा रही एक ट्रेन से 600 यात्रियों को बाहर निकालना पड़ा क्योंकि एसी बंद होने से लोग बीमार पड़ रहे थे। ये है वजह ?
यूरोप में बर्फबारी व तेज सर्दी से बचाव के लिए मोटी दीवारों से घरों का निर्माण होता है। यूरोपीय देशों में पॉल्युशन नहीं है। इसके चलते वहां का 40 डिग्री तापमान भी भारत के 50 डिग्री के बराबर है। वहां के लोग स्वयं को बर्फबारी व तेज सर्दी के वातवरण में ढाल चुके है। फ्रांस, जर्मनी के लोगों के लिए 35 डिग्री का तापमान भी जानलेवा बन जाता है। अभी वहां 41 डिग्री है जो कि अत्यधिक माना जा रहा है वाहन, ट्रैफिक लाइट आदि भी जल रहे है। ऐ सी में ब्लास्ट होने की खबरें है।