





Thar पोस्ट न्यूज। देश की सुप्रीम कोर्ट ने आज आवारा कुत्तों पर फैसला सुनाते हुए नई गाइड लाइन जारी की है। कोर्ट ने आवारा कुत्तों पर डॉग लवर्स की याचिकाएं खारिज कर दी हैं.पशु कल्याण बोर्डों द्वारा जारी नए मानक संचालन (एसओपी) को कायम रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को तीन हिस्सों में विभाजित करके मंगलवार को बड़ा आदेश सुनाया है. कोर्ट ने अपने पुराने फैसले में खूंखार कुत्तों के लिए शेल्टर होम बनाने, सरकारी संस्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने और खुली जगह पर उन्हें खाना खिलाने से रोक का आदेश दिया था. अदालत ने कहा कि देश भर में कुत्ता काटने की घटनाओं को सुप्रीम कोर्ट अनदेखा नहीं कर सकती. इसमें बच्चों, महिलाओं को बुरी तरह घायल किया गया है. अदालत इस बात को नहीं भूल सकती कि एबीसी रूल 2001 में लागू किया गया था.आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी के अनुपात में शेल्टर होम और अन्य सुविधाओं का विकास नहीं हो पाया है.


कोर्ट की नई गाइड लाइन जारी
- आवारा कुत्तों की स्टरलाइजेशन (नसबंदी) और टीकाकरण जरूरी.
- नगर निगमों आवारा कुत्तों को पकड़कर नसबंदी, टीकाकरण का काम करेगा.
- सामान्य स्वस्थ कुत्तों को स्टरलाइजेशन और वैक्सीनेशन के बाद उसी क्षेत्र में छोड़ा जाए जहां से उन्हें पकड़ा गया था
- खूंखार रेबीज संक्रमित कुत्ते वापस नहीं छोड़े जाएंगे, उन्हें शेल्टर होम में रखा जाएगा
- संक्रमित और खतरनाक व्यवहार वाले कुत्तों के लिए अलग शेल्टर तैयार किया जाए
- खुले स्थानों, गली या सड़क पर आवारा कुत्तों को खाना नहीं खिलाया जा सकता
- आवारा कु्त्तों को खिलाने के लिए हर जगह फीडिंग जोन बनाया जाए, वहां बोर्ड, व्यवस्था होगी
- स्कूल-कॉलेज अस्पताल, बस अड्डों को हटाने का निर्देश रहेगा, रेलवे स्टेशन, खेल परिसर से कुत्तों को हटाया जाए
- आवारा कुत्तों के लिए राष्ट्रीय नीति बनाने का आदेश दिया है. एकसमान आवारा कुत्ते प्रबंधन नीति तैयार होगी
- आवारा कुत्तों को लेकर एबीसी फ्रेमवर्क को ठीक ढंग से राज्य सरकारें और एजेंसियां लागू करें
साथ ही कोर्ट ने कहा कि इसे नजरअंदाज नहीं कर सकती कि ABC फ्रेमवर्क 2001 में 25 साल पहले बना था. लेकिन आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी के हिसाब से संसाधनों को बढ़ाने और उनकी संख्या में कमी की कोशिशें अधूरी रही हैं. संस्थाएं और एजेंसियां पर्याप्त कदम नहीं उठा पाई हैं. बिना योजना के नसबंदी और वैक्सीनेशन अभियान चलाए गए. इससे उद्देश्य पूरा नहीं हुआ. राज्य सरकारों ने दूरगामी सोच से काम किया होता तो ऐसे हालात नहीं होते. आवारा कुत्तों का आतंक चिंताजनक स्तर पर है. राजस्थान और गुजरात के उदाहरण सामने हैं।