Thar पोस्ट, न्यूज नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए NDA प्रत्याशी फाइनल कर लिया है। बीजेपी संसदीय बोर्ड की बैठक में एनडीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार के नाम पर मुहर भी लग गई है। द्रौपदी मुर्मू को NDA ने अपना राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित किया है। द्रौपदी मुर्मू झारखंड की पूर्व राज्यपाल हैं और वह देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए चुनाव लड़ने वाली पहली आदिवासी नेत्री होंगी। देश की पहली आदिवासी महिला राज्यपाल होने का कीर्तिमान उनके नाम पर पहले ही दर्ज है।

निर्विवाद रहा कुल 6 साल एक माह 18 दिन का कार्यकाल

झारखंड में राज्यपाल के तौर पर कुल 6 साल एक माह 18 दिन का उनका कार्यकाल निर्विवाद तो रहा ही, राज्य के प्रथम नागरिक और विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति के रूप में उनकी पारी यादगार रही है। कार्यकाल पूरा होने के बाद वह 12 जुलाई 2021 को झारखंड से राजभवन से उड़ीसा के रायरंगपुर स्थित अपने गांव के लिए रवाना हुई थीं और इन दिनों वहीं प्रवास कर रही हैं।

विपक्ष ने यशवंत सिन्हा को मैदान में उतारा
विपक्षी दलों के बीच राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार के तौर पर झारखंड के हजारीबाग निवासी कद्दावर नेता यशवन्त सिन्हा के नाम पर मंगलवार को सहमति बन गई है। अब सत्ताधारी एनडीए की ओर से झारखंड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू उम्मीदवार बनायी गई हैं तो यह भी एक अनूठा संयोग ही माना जायेगा। यशवंत सिन्हा के बाद चचार्ओं में द्रौपदी मुर्मू का नाम सामने आने से झारखंड के सियासी हलकों में भी कौतूहल और उत्साह का माहौल है।

2017 में भी राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए हुई थी द्रौपदी मुर्मू के नाम की चर्चा
रांची से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक के प्रधान संपादक हरिनारायण सिंह कहते हैं कि वर्ष 2017 में भी राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए द्रौपदी मुर्मू के नाम की चर्चा हुई थी। दरअसल एनडीए के नेता नरेंद्र मोदी चौंकाने वाले सियासी निर्णयों के लिए जाने जाते हैं और ऐसे में निर्विवाद राजनीतिक करियर वाली आदिवासी नेत्री द्रौपदी मुर्मू का नाम आगे आना कतई अप्रत्याशित नहीं माना जाना चाहिए। द्रौपदी मुर्मू के पास राज्यपाल के तौर पर 6 साल से भी ज्यादा के कार्यकाल का बेहतरीन अनुभव है। ऐसे में संभव है कि उनकी उम्मीदवारी से एनडीए पूरे देश को कई मायनों में प्रतीकात्मक संदेश देने की कोशिश कर सकती है। वैसे द्रौपदी मुर्मू का नाम देश में जनजातीय समाज के बीच पैठ बनाने की भाजपा की रणनीति का भी हिस्सा हो सकता है। इससे गुजरात के आगामी विधानसभा चुनाव और 2024 में होनेवाले आम चुनाव के मद्देनजर जनजातीय समाज के बीच एक संदेश तो दिया ही जा सकता है।