

Thar पोस्ट न्यूज। 28 सप्ताह में जन्मे अत्यंत कम वजन के बच्चे को वेंटिलेटर, सर्फेक्टेंट थैरेपी और गहन निगरानी से बचाया; 1265 ग्राम वजन और बिना ऑक्सीजन सपोर्ट के मां की गोद में लौटा घरडॉ. जी.एस. तंवर के नेतृत्व में एनआईसीयू टीम की बड़ी उपलब्धि, राजस्थान सरकार की निःशुल्क चिकित्सा व्यवस्था में हुआ संपूर्ण उपचार।










बीकानेर। महज 980 ग्राम वजन, गर्भावस्था के केवल 28 सप्ताह में जन्म, अविकसित फेफड़े और हर पल टूटती-जुड़ती सांसें। जिंदगी की शुरुआत ही मौत से मुकाबले के साथ हुई, लेकिन पीबीएम अस्पताल बीकानेर की एनआईसीयू टीम, आधुनिक चिकित्सा, सतत निगरानी, मां के धैर्य और चिकित्सकों के अथक प्रयासों ने इस नन्हे योद्धा को आखिरकार जिंदगी की जंग जिता दी।
करीब 56 दिनों तक चले कठिन उपचार के बाद 5 अक्टूबर 2026 को यह नवजात 1265 ग्राम वजन के साथ बिना किसी ऑक्सीजन सपोर्ट के स्वयं सांस लेते हुए और मां का दूध पीते हुए स्वस्थ अवस्था में अस्पताल से घर लौटा। अत्यंत कम जन्म वजन वाले इस नवजात की सफल रिकवरी को पीबीएम अस्पताल के बाल रोग विभाग की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
चूरू से बीकानेर तक जिंदगी की तलाश
जानकारी के अनुसार बच्चे का जन्म 10 अगस्त 2026 को चूरू जिले की एक परिधीय स्वास्थ्य इकाई में मात्र 28 सप्ताह के गर्भकाल में हुआ था। जन्म के समय उसका वजन केवल 980 ग्राम था। समय से लगभग तीन महीने पहले जन्म के कारण उसके फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं थे और उसे गंभीर श्वसन समस्या थी।
प्रारंभिक उपचार के बाद गंभीर स्थिति को देखते हुए परिजन उसे 11 अगस्त को पीबीएम अस्पताल बीकानेर लेकर पहुंचे, जहां एनआईसीयू में भर्ती कर तत्काल उपचार शुरू किया गया।
पहले दस दिन वेंटिलेटर पर, फिर आया नया संकट
नवजात की गंभीर स्थिति को देखते हुए चिकित्सकों ने तत्काल सर्फेक्टेंट थैरेपी दी और उसे वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा। रक्तचाप एवं अन्य महत्वपूर्ण शारीरिक मापदंडों को बनाए रखने के लिए इनोट्रोपिक दवाएं दी गईं। आवश्यकता पड़ने पर पैक्ड रेड ब्लड सेल ट्रांसफ्यूजन भी किया गया। बच्चा लगातार लगभग दस दिनों तक वेंटिलेटर पर रहा। स्थिति में सुधार आने पर उसे पहले सीपीएपी और बाद में नेजल प्रोंग ऑक्सीजन सपोर्ट पर लाया गया।
इसी बीच उपचार के दौरान बार-बार एपनिया यानी अचानक सांस रुकने की स्थिति उत्पन्न होने लगी। हालात गंभीर होने पर बच्चे को दोबारा इंट्यूबेट कर वेंटिलेटर सपोर्ट देना पड़ा। यह उपचार का सबसे चुनौतीपूर्ण दौर था।
लगातार प्रयासों के बाद 28 अगस्त को बच्चे को दोबारा सफलतापूर्वक वेंटिलेटर से हटाया गया और इसके बाद उसकी स्थिति धीरे-धीरे स्थिर होती चली गई।
मां की गोद भी बनी उपचार का अहम हिस्सा
नवजात के उपचार में आधुनिक मशीनों और दवाओं के साथ मां की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। शुरुआत में ओजी ट्यूब के जरिए फीडिंग दी गई। स्वास्थ्य में सुधार के साथ चम्मच से दूध देने की प्रक्रिया शुरू की गई और बाद में मां को स्तनपान कराने के लिए प्रशिक्षित किया गया।
परिजनों को कंगारू मदर केयर की नियमित सलाह दी गई। मां ने लगातार बच्चे को अपने सीने से लगाकर कंगारू मदर केयर दी, जिससे शरीर का तापमान बनाए रखने, वजन बढ़ाने और बच्चे की रिकवरी में महत्वपूर्ण सहयोग मिला।
करीब दो महीने के उपचार के बाद 5 अक्टूबर को बच्चे का वजन बढ़कर 1265 ग्राम हो गया। वह बिना ऑक्सीजन सपोर्ट के स्वयं सांस लेने लगा और स्तनपान भी करने लगा।
अस्पताल से छुट्टी देने से पहले आरओपी स्क्रीनिंग कराई गई, जो सामान्य पाई गई। 2डी इको जांच में किसी प्रकार की जन्मजात हृदय संबंधी समस्या सामने नहीं आई और ब्लड कल्चर भी स्टेराइल रहा। सुनने की क्षमता के आकलन के लिए BERA/OAE जांच फॉलोअप में कराने की सलाह दी गई है।
डॉ. जी.एस. तंवर के नेतृत्व में टीम ने लड़ी हर सांस की लड़ाई
इस अत्यंत कम वजन वाले नवजात की सफल रिकवरी बाल रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. जी.एस. तंवर के मार्गदर्शन में एनआईसीयू टीम के सामूहिक प्रयासों से संभव हुई।
टीम में डॉ. रेनू अग्रवाल, डॉ. कुलदीप सिंह बिठू, डॉ. लक्ष्मण, डॉ. इंदिरा, डॉ. अंजली, डॉ. भरत, डॉ. संजय, डॉ. हर्षित, डॉ. गैलेक्सी, डॉ. ईशा और डॉ. राजेश ने उपचार एवं निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वहीं नर्सिंग ऑफिसर्स बसंती, सिगार, धन्नाराम, अनिता, पायल, पिंकी, प्रियंका, तारा, सीमा, नवीन सहित समस्त नर्सिंग स्टाफ ने दिन-रात क्लीनिकल केयर करते हुए बच्चे की हर सांस और हर बदलाव पर निगरानी बनाए रखी।
बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. जी.एस. तंवर ने कहा कि 980 ग्राम के नवजात का स्वस्थ होकर घर जाना केवल भावनात्मक रूप से सुखद क्षण ही नहीं, बल्कि चिकित्सकीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण परिणाम है।
उन्होंने कहा, “980 ग्राम के इस नवजात का स्वस्थ होकर जाना केवल एक चमत्कार नहीं है। इंटैक्ट सर्वाइवल जैसा सार्थक परिणाम निरंतर मॉनिटरिंग, प्रोटोकॉल आधारित उपचार और अनुशासित देखभाल का परिणाम है। यही हमारी एनआईसीयू की नींव है। यह उपलब्धि पूरी टीम के समर्पण, माता-पिता के विश्वास और ईश्वर की कृपा से संभव हुई है।”
टीम की दक्षता और सरकारी चिकित्सा व्यवस्था पर विश्वास का प्रमाण: डॉ. एस.के. वर्मा
सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य एवं नियंत्रक डॉ. एस.के. वर्मा ने पूरी टीम को बधाई देते हुए कहा कि 980 ग्राम के अत्यंत कम वजन वाले नवजात का सफल उपचार बाल रोग विभाग एवं एनआईसीयू टीम की क्लीनिकल दक्षता का प्रमाण है।
उन्होंने कहा कि डॉ. जी.एस. तंवर के नेतृत्व में चिकित्सकों, नर्सिंग, पैरामेडिकल और अन्य सहयोगी स्टाफ ने जिस समर्पण के साथ कार्य किया, वह सराहनीय है।
डॉ. वर्मा ने कहा कि राजस्थान सरकार की निःशुल्क चिकित्सा योजनाओं के कारण गंभीर और जटिल रोगियों को भी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में उच्च स्तरीय उपचार उपलब्ध हो रहा है। गंभीर बच्चों के टर्शियरी एवं क्वाटर्नरी स्तर के उपचार के लिए आमजन का मेडिकल कॉलेज अस्पताल पर बढ़ता विश्वास इस व्यवस्था की सफलता को दर्शाता है।
