





Thar पोस्ट न्यूज (जितेंद्र व्यास)। यहाँ ऊंट का कितना महत्व है इसका जिक्र यहाँ करना चाहूंगा। प्राचीन पश्चिमी राजस्थान खासकर बीकानेर में ऊंट, रसूखदार समृद्ध घरों का प्रतीक रहा। यहाँ तक कि विवाह योग्य एक युवती भी अपनी माँ से यही कहती थी की उसकी शादी उसी घर में हो जहाँ सांड अर्थात ऊंटनी हो। 1994 में बीकानेर में ऊंट उत्सव की शुरुआत हो चुकी थी और कतरियासर और बीकानेर के स्टेडियम में इसका आयोजन होने लगा। विदेशी मेहमानों के साथ दिल्ली, मुम्बई, गुजरात, जयपुर सहित अनेक स्थानों से लोग आने लगे। दुनियावी पर्यटन मानचित्र पर ऊंट उत्सव तेज़ी से उभरा। कतारितासर में ऊंट दौड़, अग्नि नृत्य सहित अनेक रोचक कार्यक्रमों ने लोगों को अपनी ओर खींचा यह सिलसिला एक दशक से अधिक समय तक चला। यह वह दौर था जब फ़िल्मी दुनिया के नामचीन कलाकार प्रस्तुति देने बीकानेर पहुचे। जूनागढ़ परिसर में भी अनेक कार्यक्रम हुए। उत्सव इस समय तक तीन दिन का हुआ करता था। एक दिन बीकानेर और दो दिन कतरियासर में। विदेशी सैलानी बड़ी संख्या में शामिल होते थे। ऊंट उत्सव ने 2005 में लिया घुमाव
समय परिवर्तनशील है। बात 2005 की है। कतरियासर में विदेशी जोड़ों का विवाह कार्यक्रम था। तब सहायक निदेशक हनुमानमल आर्य ने दो विदेशी युवतियों और युवकों का हिन्दू रीति से विवाह करवाया। मैं भी इसका प्रत्यक्ष गवाह बना। बीकानेर के प्रचलित मारवाड़ी गीत केसरिया लाडो जीवतों आदि गाये गए। फेरे भी हुए। यादगार सांस्कृतिक संध्या ने सभी का मन मोह लिया। इसके बाद तेजी से हालात बदले। गाँव में एक युवक युवती के भाग जाने की घटना के बाद सिद्ध संप्रदाय के लोगों ने यह कहते हुए धरना दे दिया की हमारी संस्कृति पर विपरीत असर पड़ रहा है। जिला कलेक्टर कार्यालय के सामने धरना चला। कतरियासर से ऊंट उत्सव हटाने के बाद ही धरना हटाया गया। इसके बाद यह लाडेरा के रेतीले धोरे पर शिफ्ट हुआ। बीकानेर में रेतीले धोरों और ऊंट सफारी के विशेषज्ञ वीरेंद्र सिंह व विजय सिंह थेलासर से कई बार मेरी पूर्व में बातचीत हुई। उनके अनुसार उत्सव के लिए यह प्रतिकूल समय था लेकिन हमेशा की तरह हम आगे बढे।
लाडेरा गांव में 2013 तक सब अच्छा चल रहा था। लेकिन पर्यटन विभाग में प्रशासनिक स्तर पर कुछ फेर बदल हो रहे थे। लंबे समय से ऊंट उत्सव को देख रहे सहायक निदेशक एचएम आर्य की ठीक पकड़ थी। उत्सव के लिए लाडेरा भी आर्य की खोज थी। लेकिन 2013 में ही उन्होंने स्वेच्छिक सेवा निवृति ले ली। तब जयपुर से नए सहायक निदेशक उपन्द्रे सिंह शेखावत को भेजा गया था। 2014 में उत्सव के दिनों में ही उनकी ट्यूनिंग लाडेरा में कम बैठते दिखी। हालाँकि उन्होंने बेहतर प्रयास किये। तत्कालीन कलेक्टर आरती डोगरा थी। वहां ऊंट उत्सव के दौरान प्रशानिक स्तर पर दिखाई जा रही अधिक सख्ती मेलार्थियों को नागवार लगी। मेले में कुछ समाजकंटक भी थे उन्हें भी मौका हाथ लग गया। पुलिस लाठीवार भी हुआ। इससे मेले का माहौल धीरे धीरे बिगड़ने लगा। मेले में शामिल लोग लाठियां व् अन्य हथियार ले आये। खाली बोतलों में मिटटी भर कर देशी विदेशी लोगों पर फेंकी गयी। माहौल तेज़ी से बिगड़ा। प्रशासन के सामने मेले से लोगो को निकालने का संकट हो गया। जिला कलेक्टर ने रात में आरएसी को बुलाकर मेला किसी तरह खाली करवाया। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने बीकानेर के धोरों पर किसी तरह का आयोजन करवाने पर रोक लगा दी थी। उत्सव की अवधि भी तीन दिन के बजाय दो दिन कर दी गई। मेला शहर तक सिमट गया। इस तरह खूबसूरत मेला धोरों से हटकर यह उत्सव शहर में ही हुआ। वर्षों बाद 2023 में रायसर के धोरों में भी इसके आयोजन शुरू हुए। तब से यहां आयोजन चल रहे है।




