





Thar पोस्ट। प्राकृतिक रूप से राजस्थान के लिए अति महत्वपूर्ण अरावली पर्वत व इसकी पहाड़ियों में खनन को लेकर कांग्रेस व बीजेपी आमने सामने है। जबकि पर्यावरणविदों का कहना है कि अरावली की छोटी और मध्यम ऊंचाई की पहाड़ियां यहां वर्षा जल को रोकने, भूजल रिचार्ज, धूल भरी आंधियों को थामने और थार रेगिस्तान के फैलाव को रोकने में अहम भूमिका निभाती हैं। पर्यावरणविदों की चेतावनी है कि यदि ये पहाड़ियां संरक्षण से बाहर हुईं तो अलवर, जयपुर, दौसा, सीकर, झुंझुनूं, उदयपुर और राजसमंद जैसे जिलों में भूजल स्तर और नीचे जाएगा, सूखे की तीव्रता बढ़ेगी और खनन व अनियंत्रित निर्माण को बढ़ावा मिलेगा। पहले से ही जल-संकट से जूझ रहे राजस्थान के लिए यह स्थिति पर्यावरणीय के साथ-साथ आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य संकट को जन्म दे सकती है। इसके साथ ही पर्यावरणविदों का मानना है कि यह लड़ाई केवल अदालत या सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज की साझा जिम्मेदारी है। अरावली का नुकसान स्थायी हो सकता है, क्योंकि एक बार पहाड़ कटे और जलधाराएं टूटीं तो उन्हें वापस लाने में सदियां लग जाती हैं। इसी कारण जनजागरण और सवाल उठाना आज भविष्य को सुरक्षित करने की जरूरत बन गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली की नई परिभाषा स्वीकार किए जाने से राजस्थान में पर्यावरण और राजनीति की बहस तेज हो गई है। करीब 18 साल बाद राजस्थान में अरावली का विवाद एक बार खड़ा होता नजर आ रहा है। हालिया सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकार कर लिया है। इसके तहत जिस भू-भाग की ऊंचाई आसपास के सामान्य धरातल से कम से कम 100 मीटर अधिक होगी, उसे अरावली हिल माना जाएगा। वहीं 500 मीटर के दायरे में स्थित दो या अधिक ऐसी पहाड़ियों को अरावली रेंज की श्रेणी में रखा जाएगा। केंद्र का तर्क है कि इससे पूरे देश में अरावली की एक समान और स्पष्ट परिभाषा लागू हो सकेगी।


राजस्थान में बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेंद्र राठौड़ ने बयान दिया है कि सरकार को अरावली के मामले में सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटिशन दायर करनी चाहिए। यानी सरकार अपनों से ही घिरी नज़र आ रही है। ‘सेव अरावली’ कैंपेन देश भर में शुरू हो चुका है। राजस्थान में इस कैंपेन की अगुवाई पूर्व सीएम अशोक गहलोत कर रहे हैं। बीजेपी इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस पर सियासत करने के आरोप लगा रही है।