Thar पोस्ट (जितेंद्र व्यास)कहते है : जहां न पहुंचे रवि-वहां पहुंचे कवि। जहाँ न पहुंचे कार वहां पहुंचे पत्रकार।। जहाँ सूर्य की किरण नहीं पहुंच पाती वहां कवि की कल्पना पहुंच जाती है और जहां कार नहीं पहुंचती वहां पत्रकार पहुंच जाता है। उत्तराखंड में प्रलय बाढ़ आने पर केंद्र व राज्य सरकार ने संपर्क टूटने की बात कही थी। सभी मार्ग बह गए थे। लेकिन पत्रकारों ने प्रलय को लाइव कर आपके टीवी रूम तक तस्वीरें पहुंचाई थी। सभी मीडिया संस्थानों के हेलीकाप्टर प्रलय स्थल के पास पहुंचे। कोरोना काल में भी अनेक पत्रकारों ने तंग गलियों में पहुंच कर दम तोडते लोगों तक मेडिसिन किट व भोजन सामग्री पहुंचाई थी। रूस-यूक्रेन युद्ध मे भी अपनी जान पर खेलकर तस्वीरों को लाइव किया था। अनेक पत्रकार मारे जाते है लेकिन कोई भी पत्रकार मरने के बाद शहीद नहीं कहलाता। अपने घर परिवार की समस्याओं व आर्थिक हालात से जूझता हर हाल में खबरों को आम आदमी तक पहुंचाता है रोचक जानकारियां शेयर करता है। इसके बाद भी रिश्वत लेने, शराबबाज़ी, शवाबबाज़ी के आरोप लगते रहते हैं। पत्रकारों की दुनिया की बात करें तो हालात आज भी सुधर नहीं पाए है। पत्रकारों के बीच ही गलाकाट राजनीति हावी है। देशभर के किसी भी मीडिया संस्थानों की नब्ज टटोलने का प्रयास करोगे तो आपका वहां वास्ता दो तरह के गुटों से पड़ेगा। एक गुट के पत्रकार आपको संपादक के इर्द गिर्द चमचागिरी करते मिलेंगे। इनका स्लोगन भी यही है कि ‘काम मत कर काम की फिक्र कर’। इन्हे कुछ लोग तैलीया पत्रकार भी कहते हैं। दूसरे गुट में मेहनती व ईमानदार किस्म के पत्रकार मिलेंगे। इनका जीवन गांधीवाद या स्वाभिमान से प्रेरित रहता है। मजे की बात यह है कि सभी तरह के वेतन लाभ भी तैलीया किस्म के पत्रकारों को मिलते है। हालांकि यह तैलिया गुट देर सवेर संपादक व मीडिया संस्थान के पतन का कारण भी बनते है। देश में अधिकांश मीडिया संस्थानों में यही हालत है। इसके अलावा सभी पत्रकारों को एक मंच या जाजम पर लाने का विफल प्रयास होते रहे है। पत्रकारों के वेतनमान सहित अन्य मुद्दों को लेकर फाइलें दशकों से धूल धूसरित हो रही है। हालात तो यह है कि जिस पत्रकार ने अपने 20 साल 30 साल पत्रकारिता को झोंक दिए है उसे सरकारी स्तर पर अधिस्वीकृत होने के लिए सिफारिशो की जरूरत पड़ती है। क्रमश अगले अंक में जारी …