Thar पोस्ट, न्यूज। भारत मे न केवल महानगरों बल्कि छोटे शहरों में भी चांदी के नाम पर जर्मन सिल्वर बेचने का धंधा चल रहा है। सोने के आभूषण की शुद्धता लेकर अक्सर लोगों की शिकायत सुनने को मिलती है। वहीं चांदी के आभूषण में भी कम खेल नहीं है। इसका पता लोगों को तब चलता है, जब चांदी के पुराने आभूषण बेचने जाते हैं और ज्‍वेेलर उसे जर्मन सिल्वर बताता है। यूपी, गुजरात, राजस्थान आदि में इन दिनों जर्मन सिल्वर को चांदी का आभूषण बता कर बेचने का खेल शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्र की ज्‍वेलरी की दुकानों में खुलेआम चल रहा है। ज्‍वेलर्स इसमें जम कर मुनाफा कमा रहे हैं। विभिन्न अवसरों पर चांदी की पायल, चाबी रिंग, बिछिया, कीया, सिंदूरदानी, चैन,पान पत्ता, मछली आदि की मांग सबसे अधिक होती है। इस दौरान यह खेल बढ़ जाता है।भारतीय मानक ब्यूरो (बीएसआइ) के अधिकारियों व रीफिनिटिव के विश्लेषक जीएफएमएस द्वारा तैयार सिल्वर इंस्टीट्यूट के विश्व रजत सर्वेक्षण 2019 के अनुसार चांदी के नाम पर खेल हो रहा है। सामान्य तौर पर जर्मन सिल्वर और चांदी के बीच कोई अंतर नहीं दिखता। जर्मन सिल्वर के बने आभूषण मुख्य रूप से आगरा, मथुरा, कोलकाता,राजकोट व अहमदाबाद से पूरे देश में आपूर्ति होते है। हॉलमाकिर्ंग एक फीसद भी नही है।कैरोमीटर नाम का उपकरण आपको चांदी के सिक्के या बर्तन में शुद्धता बता देगा। सराफ कसौटी पत्थर रखते हैं। चांदी का सिक्का उस पर रगड़वाएं। लकीर सफेद है तो शुद्ध चांदी है और पीली है तो इसमें तांबा, जस्ता, रांगा और एल्युमीनियम अधिक मिला है। इसी तरह चांदी के सिक्के को लोहे की रेती से साफ कर सकते हैं और साफ हिस्से पर सल्फ्यूरिक एसिड डाल सकते हैं। अगर रंग काला हुआ तो सिक्का शुद्घ है और हरा हुआ तो अशुद्ध। आप सिक्के को लोहे के ठोस टुकड़े पर मारकर देखें, यदि खनक की आवाज अधिक है तो सिक्का अशुद्ध है।