Thar पोस्ट न्यूज। दीपावली के दिनों में राजस्थान में त्यौहार पर आंगन में मांडना बनाने की एक प्राचीन परम्परा रही है खासकर ग्रामीण अंचल में आज भी मांडना उकेर कर घरों को सजाया जाता है। मांडना राजस्थानी संस्कृति की पहचान भी है। पुराने समय में शुभ अवसर पर घर को मांडना बनाकर सुंदर बनाया जाता था. पहले महिलाएं आंगन को गोबर से या लाल मिट्टी से लिपती थी और उसके बाद अपने घरों, चौखटों और आंगन को गेरू, सफेद मिट्टी और चावल के घोल से सजाती थी लेकिन आजकल अलग-अलग रंगों को भी काम में लिया जाने लगा है. आंगन में चौक पुराई से बनाई गई सफेद कलाकृतियों से घर साफ और सुंदर लगता था. राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में तो आज भी औरतें गोबर से या लाल मिट्टी से आंगन को लीप कर आटे या रंगों से चौक पुराई करती है, लेकिन शहरों में यह परंपरा पूरी तरीके से विलुप्त हो गई है.

आंगन में चौक पुराई से देवताओं और मेहमान के स्वागत के लिए यह कलाकृतियां बनाई जाती थे. घर में ये बनाना सुख समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता था. दीपावली के शुभ अवसर पर औरतें कमल, दीपक, सूरज, गाय, मोर, कलश, स्वस्तिक और बेल-बूटे जैसी आकृतिया बनाती थी. हर आकृति अपना एक अलग मतलब होता था. कमल का फूल बनाना देवी लक्ष्मी का प्रतीक, दीपक ज्ञान का और स्वस्तिक शुभता का प्रतीक माना जाता था. मांडना बनाते समय महिलाए लोकगीत गाती हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिभाव और उल्लास से भर जाता है।

  • अर्थ: ‘मांडना’ शब्द ‘मंडन’ से आया है, जिसका अर्थ है ‘सजावट’। 
  • प्रकृति: यह एक पारंपरिक, हाथ से बनाई जाने वाली कला है। 
  • सांस्कृतिक महत्व: इसे शुभ, समृद्धि और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, और इसे घर में लक्ष्मी का स्वागत करने का एक तरीका माना जाता है। 
  • कलाकार: यह मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा की जाती है और इसे महिलाओं की सुघड़ता और रचनात्मकता का प्रतीक माना जाता है। 
  • सामग्री: पारंपरिक रूप से, इसे गोबर, लाल मिट्टी, सफेद मिट्टी और चावल के घोल से बनाया जाता है। 
  • डिजाइन: इसमें कमल, दीपक, स्वस्तिक, मोर और अन्य पारंपरिक आकृतियां शामिल हैं। 
  • अवसर: इसे विशेष रूप से दीपावली, होली, नवदुर्गा, महाशिवरात्रि और अन्य मांगलिक अवसरों पर बनाया जाता है।