Thar पोस्ट, बीकानेर। रुक्टा ( राष्ट्रीय ) ने राज्य सरकार से राजकीय महाविद्यालयों में कार्यरत राजस्थान स्वेच्छा ग्रामीण शिक्षा सेवा 2010 ( आरवीआरईएस) महाविद्यालय शिक्षकों का पदनाम आचार्य/सह आचार्य/सहायक आचार्य करने की मांग की है। संगठन के महामंत्री डॉ सुशील कुमार बिस्सु ने उच्च शिक्षा मंत्री जी को पत्र लिखकर मांग की है कि राजस्थान सरकार द्वारा 2 फरवरी 2018 को जारी अधिसूचना द्वारा राज्य के महाविद्यालयों में कार्यरत सभी व्याख्याताओं के पदनाम आचार्य/सह/सहायक आचार्य कर देने के बावजूद महाविद्यालयों के आरवीआरईएस शिक्षकों का पदनाम अभी भी व्याख्याता बना हुआ है, जबकि नियमों में स्पष्ट उल्लेख है कि 1 जनवरी 2004 के बाद राजकीय महाविद्यालय के शिक्षकों पर राजस्थान शिक्षा सेवा (महाविद्यालय शाखा) नियम 1986 एवं उनके संशोधन स्वत: लागू होते हैं, इसलिए 2 फरवरी 2018 से महाविद्यालय के शिक्षकों के लिए लागू पदनाम उच्च शिक्षा संवर्ग में समाहित आरवीआरईएस शिक्षकों के लिए भी लागू हो जाने चाहिए थे। इनके पदनाम परिवर्तन के लिए पृथक से नियमों में संशोधन की आवश्यकता नहीं है। महाविद्यालय और विद्यालय शिक्षा में कनिष्ठ लिपिक का पदनाम परिवर्तित होकर जब कार्यालय सहायक हुआ तो आरवीआरईएस से आये हुए कनिष्ठ लिपिकों का पदनाम भी स्वत: ही कार्यालय सहायक हो गया। फिर आरवीआरईएस व्याख्याताओं के पदनाम परिवर्तन के लिए पृथक से नियमों का क्या औचित्य है?संगठन के अध्यक्ष डॉ दीपक शर्मा ने बताया कि एक ही संवर्ग और समान वेतन के रहते व्याख्याता और सह आचार्य/सहायक आचार्य पद नाम की दोहरी व्यवस्था औचित्यहीन है। साथ ही, आयुक्तालय, कॉलेज शिक्षा द्वारा आरवीआरईएस महाविद्यालय शिक्षकों को सह/सहायक आचार्य के स्थान पर व्याख्याता (आरवीआरईएस) पद से सम्बोधित करना नैसर्गिक न्याय के विरुद्ध है। इस व्यवस्था से शिक्षक समुदाय में गहरा रोष है। अत: शिक्षकों की भावनाओं को समझते हुए आरवीआरईएस शिक्षकों के पदनाम भी अविलम्ब आचार्य/सह आचार्य/सहायक आचार्य किये जाने चाहिये।डॉ सुशील कुमार बिस्सु
महामन्त्री- रुक्टा( राष्ट्रीय)