IMG 20250527 111143 11 पत्रकारिता दिवस विशेष : इतने बिगड़ चुके हैं हालात ! Rajasthan News Portal देश
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Thar पोस्ट विशेष (जितेंद्र व्यास)। हिंदी पत्रकारिता दिवस पर शुभकामनाएं देने का सिलसिला सुबह से चल रहा है। पत्रकार व शुभ चिंतक एक दूसरे को संदेश दे रहे हैं। लेकिन जो कुछ पत्रकारिता के नाम पर चल रहा है वह वास्तव में खतरनाक व सोचनीय है। सरल शब्दो में कहा जा सकता है कि खतरे में है पत्रकारिता! पिछले केवल पांच वर्षों में इस पेशे में इतना परिवर्तन आया है कि देश के अधिकांश पत्रकार अपने बच्चों को या पारिवारिक सदस्यों को इस कार्य पेशे से दूर रखना चाहते है। केवल दो प्रतिशत चुनिंदा पत्रकारों के पुत्र या पुत्री इस पेशे से जुड़े हुए है। जैसा कि मैंने शीर्षक में लिखा कि इस पेशे में हालात बिगड़ चुके है। पत्रकार अब खेमो में, संगठनों में बंट चुका है। देशभर की बात छोड़िए छोटे छोटे शहरों में पांच छह खेमे है। हर गुट में 15 से 20 पत्रकार सक्रिय है। प्रत्येक संगठन अन्य संगठनों को कमतर साबित करने में रात-दिन एक किए हुए है काश वह अपना ध्यान अच्छे समाचारों को बनाने में दे पाता। खेमो में बंटे पत्रकारों द्वारा एक दूसरे को देख लेने की धमकियां तक दी जा रही है। हालात इस कदर खराब हो रहे है कि पत्रकारिता में सहयोग के नाम पर संगठन सहयोग, चंदा लेना, धमकाना, प्रेस कांफ्रेंस के ठेके लेना आदि कार्य जोरो पर चल रहे है। राजनेताओं, जिला प्रशासन व प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष भी अनेक पत्रकार यह साबित करने का प्रयास करते है कि इस धरा के सबसे क्षेष्ठ पत्रकार वो ही है अन्य गुट के पत्रकारों की आलोचना करने से भी गुरेज नही करते। भले ही आप उनकी खबरों को मोबाइल या अखबारों में तलाशते रहो और वे आपको न मिले। प्रेस कांफ्रेंस की मर्यादाओं को भी ताक पर रखा जा रहा है। धक्का-मुक्की करना या फिर एक दूजे को नीचा दिखाना। क्या है ये सब? वे उस समय यह भूल जाते है कि वे केवल पत्रकारिता के पेशे को और ज्यादा खोखला कर रहे है। हिंदी पत्रकारिता के बड़े संस्थानों में हालात पहले से ज्यादा खराब हो रहे है वहां रेवेन्यू घट रहा है खर्चे बढ़ रहे है उनके लिए डिजिटल मीडिया ने कोढ़ में खाज का काम किया है। अखबार कार्यालयों व संस्थानों में बढ़ते तनावों के चलते वहां के दर्जनों पत्रकारों ने दूसरा कॅरियर अपना लिया या संस्थानों ने ही उनसे तौबा कर ली। कई पत्रकारों ने अपना यू ट्यूब चैनल या वेब न्यूज पोर्टल खोल लिया। इसके अलावा देशभर में पत्रकारिता व प्रेस के नाम न जाने कितने लोग बाज़ार में सक्रिय है। जो प्रेस के नाम पर राजनीति रेलवे, हॉस्पिटल, पुलिस में सक्रिय है। क्या सरकार का दायित्व नहीं है कि इनके खिलाफ कार्रवाई कर फर्जीवाड़ा रोक कर पत्रकारिता के खत्म होते पेशे को बचाए? अभी भी समय है। यदि पत्रकार एक जुट होकर कम से कम इतना तो करें कि पत्रकारिता की गिरती साख बच सके। पत्रकारों से समाज बहुत उम्मीद रखता है। शहर या गाँव मे कोई व्यक्ति वास्तव में पत्रकारिता कर रहा है तो उसे प्रोत्साहित करें। अन्यथा समाज के पत्रकारिता रूपी दर्पण का टूटकर बिखरना तय है।


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