Thar पोस्ट। प्रदेश में चुनावी बिसात बिछ चुकी है। दोनों ही प्रमुख दलों में 35 बागी नेता ताल ठोककर मैदान में तैयार है। राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन भरे जा चुके हैं। कांग्रेस ने एक सीट गठबंधन के लिए छोड़ते हुए 199 सीटों पर प्रत्याशी उतारे हैं, जबकि भाजपा ने पूरी 200 सीटों पर उम्मीदवारों उतारे हैं। प्रदेश की 200 विधानसभा सीटों के लिए 2,605 उम्मीदवारों ने 3,436 नामांकन पत्र भरे हैं। राजस्थान में कई सीटों पर इन पार्टियों के बड़े  बागी नेताओं ने आलाकमान की मुश्किलें बढ़ा दीं हैं। यदि पिछले चुनाव की बात करें तो 2018 के चुनाव में 29 सीटें ऐसी थी, जहां हार-जीत का अंतर 1000 से 5000 वोट का था। इसमें 13 पर भाजपा, 9 कांग्रेस, चार अन्य और 3 निर्दलीय उम्मीदवार की जीत हुई थी। वहीं, 9 सीटें ऐसी भी थीं, जहां 1000 से कम वोट पर हार-जीत हुई थी। ऐसे ये बागी नेता भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों का खेल बिगाड़ सकते हैं। लेकिन इस बार सत्ताधारी दल कांग्रेस से बागी होकर 16 नेताओं ने नामांकन दाखिल किया है। राजगढ़-लक्ष्मणगढ़ से मौजूदा विधायक जौहरी लाल, बसेड़ी से वर्तमान विधायक खिलाड़ी लाल बैरवा, नोखा से कन्हैया लाल झंवर, लूणकरणसर से वीरेंद्र बेनीवाल, छबड़ा से नरेश मीणा, सादुलशहर से ओम बिश्नोई, सवाई माधोपुर से अजीज आजाद, नागौर से हबीबुर्रहमान, शाहपुरा से आलोक बेनीवाल और सूरसागर से रामेश्वर दाधीच समेत अन्य बागी होकर चुनाव मैदान में हैं। बसेड़ी से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे खिलाड़ी लाल बैरवा को सचिन पायलट का करीबी माना जाता है तो जोधपुर के मेयर रह चुके हैं रामेश्वर दाधीच सीएम अशोक गहलोत के करीबी हैं। 

बीजेपी में 19 बागी: कांग्रेस के मुकाबले भाजपा में बागियों की संख्या ज्यादा है। पार्टी से बगावत कर 19 नेता चुनाव मैदान में हैं, जिनमें पांच मंत्री भी रह चुके हैं। पार्टी से बगावत कर चित्तौड़गढ़ से मौजूदा विधायक चंद्रभान सिंह आक्या और शाहपुरा (भीलवाड़ा) से वर्तमान विधायक कैलाश मेघवाल ने निर्दलीय पर्चा भरा है। मेघवाल को पार्टी से निष्कासित भी किया जा चुका है। इसके अलावा झोटवाड़ा से राजपाल सिंह शेखावत, डीडवाना से यूनुस खान, कामां से मदन मोहन सिंघल और खंडेला से बंशीधर बाजिया चुनाव मैदान में उतर आए हैं। कैलाश मेघवाल, राजपाल सिंह शेखावत और युनूस खान को वसुंधरा राजे का करीबी माना जाता है। इसके अलावा युवा नेता रविंद्र सिंह भाटी ने शिव सीट से निर्दलीय उतरकर ताल ठोंक दी है। भाटी करीब सात दिन पहले भाजपा में शामिल हुए थे, लेकिन पार्टी से टिकट नहीं मिलने के कारण उन्होंने बगावत कर दी है और फिर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गए। 

डैमेज कंट्रोल की अंतिम कोशिश

भाजपा ने पार्टी के सभी जिला अध्यक्षों से बगावत कर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे नेताओं की सूची मांगी हैं। माना जा रहा है कि पार्टी के बड़े नेताओं बगावत कर चुनाव में उतरे उम्मीदवारों को लेकर बैठक कर चर्चा करेंगे और आगे की रणनीति बनाएंगे। नामांकन वापसी को लेकर नेताओं को मनाने का सिलसिला भी शुरू हो सकता है। चुनाव आयोग ने 9 नवंबर तक नाम वापस लेने का समय दिया है। ऐसे में जो नेता मानने को तैयार होंगे, उनके नामांकन पत्र वापस भी कराए जा सकते हैं। इसी तरह कांग्रेस भी बागी नेताओं को मनाने का काम कर सकती है, ताकि कम से कम सीटों पर बागी नेताओं का सामना करना पड़े।