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IMG 20230507 154414 2 भाग 3 : पत्रकारिता का यह काला सच, पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाएंगे , देशभर में है ये हालात Rajasthan News Portal देश
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Thar पोस्ट (जितेंद्र व्यास)। यह सीरीज प्रकाशित किये जाने के दौरान मेरे पत्रकार मित्र ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि 99 प्रतिशत नहीं बल्कि 100 प्रतिशत पत्रकार नहीं चाहते कि उनके बच्चे इस फील्ड में आये। इसी तरह मैने जब एक नामचीन व्यापारी से पत्रकारों के वेतनमान व अन्य समस्याओं की चर्चा की तो उनका उत्तर मजेदार था। उनका कहना था -यदि घोड़ा केवल घास व दाल में खो जाएगा तो वह अपने मालिक के लिए दौड़ेगा कब ? उसे मालिक खूब दौड़ाता है नकेल कस कर रखता है। इससे घोड़ा स्वस्थ रहता है। खैर अपनी -अपनी सोच है। लेकिन फील्ड चाहे कोई भी हो दौड़ना पड़ता है। पत्रकार न केवल अपने वेतनमानों की समस्या से जुझता है बल्कि संपादक विभाग के अंदरूनी हालातो से भी खूब संघर्ष करता है। संपादक को केवल रिजल्ट पर विश्वास रहता है उसकी स्थिति प्रायः थ्री इडियट के प्रोफ़ेसर वीरू virus की तरह होती है। इस गलाकाट मार के बीच पत्रकारो के आपसी संघर्ष खींचतान का असर देश की समूची पत्रकारिता दुनिया पर हुआ है। अनेक नामचीन पत्रकारो की या तो कलम तोड़ दी गई है या फिर उन्हें खामोश रहने के लिए मजबूर किया गया है। वर्ष 2012 के बाद तो देश के पत्रकारिता जगत की कूँचे हिल गई है। यह ठीक वैसा ही है जब भारतीय क्रिकेट टीम ने धुरंधर वेस्ट इंडीज को हराकर विश्व कप जीता था। वेस्टइंडीज की टीम आज भी जीत की आस में विश्व विजेता बनने का रास्ता तलाश रही है। 2012 के बाद पत्रकारिता का परिदृश्य बदल सा गया। आर्थिक मंदी, प्रॉपर्टी में गिरावट के साथ इलेक्ट्रॉनिक ऑनलाइन वेब मीडिया आदि का बढ़ता प्रभाव आदि अनेक कारक बने। उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश में जन्मदिन, शादी व घरेलू कार्यक्रम लोकल अखबार व टीवी चैनल के प्रथम पेज का हिस्सा बनने लगे। व्यवसायीकरण तेज़ी से हुआ। ऐसे पत्रकार भी आ गए जिन्हें यह पता ही नहीं है कि पत्रकारिता में विलोम पिरामिड, इंट्रो, टूट, कापा, सिंगल, डबल, ट्रिप्प्ल, सिक्स कॉलम, एडिटोरियल आदि का क्या महत्व है। मुझे बीस साल पहले एक माह तक पता नही चल पाया था कि आखिर ये टूट क्या होती है। अब तो वो पत्रकार अधिक सक्सेस है जिसके पास डिजिटल, मोबाइल या कंप्यूटर का अधिक ज्ञान है। इसके चलते वो पत्रकार अधिक पिछड़ रहे है जो पत्रकारिता के मापदंडों की पालना कर रहे है। डिजिटल व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चलते प्रिंट मीडिया के हालात बद से बदतर हो रहे है जाहिर है इसका सर्वाधिक असर वहां काम करने वाले पत्रकारों व अन्य लोगों पर हुआ है। मीडिया संस्थान के मालिक लगातार खर्च कम करने में लगे हुए है। पांच कर्मचारियों की जगह एक कर्मचारी से काम चलाने या कहें कि बैल मार खेती के प्रयास हो रहे है। कोरोना काल के बाद तो कमर ही टूट गई। इसके बाद आये नए चलन की बात करें तो वह और भी सोचनीय है। खरी खरी कहूँ तो यदि आपको अपनी पत्रकारिता को बचाना है तो आपको सत्ता व कॉर्पोरेट हित व पक्ष में ही समाचार प्रकाशित करने होंगे। अन्यथा राजनीति का डंडा हाज़िर है। फैसला आपको करना है कि बतौर पत्रकार आप कौनसा रास्ता चुनते है ? … आगामी सीरीज – तेज़ी से बदलता भारतीय समाज- बिखरते परिवार


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