Thar पोस्ट, न्यूज (जितेंद्र व्यास)। पत्रकारिता का शब्द सुनते ही आपके जेहन में माइक हाथ मे लिए या कैमरा हाथ मे, मोबाइल हाथ मे लिए एक छवि उभरती है। लाइम लाइट में रहने वाले लोगों के साथ पत्रकारों में एक ग्लैमर झलकता है, लेकिन इसके पीछे की दर्दभरी काली दुनिया से आमजन या पाठक वाकिफ नहीं होता। यह विषय सामान्य सा है लेकिन इसके अंदरखाने की हकीकत से केवल वो ही वाकिफ होते है जो किसी कारण से इस पेशे में आ गए हैं या पत्रकारिता के जज्बे को लेकर इस धंधे से जुड़ गए है। पत्रकारिता को जॉब नहीं कह सकते। यह एक सत्य का बिज़नस व्यवसाय है। इसके अनेक पहलू है। यहां अनेक मुद्दों पर चर्चा होगी। मैंने इस काले सच को तीन भागों में बांटा है। पत्रकारिता दिवस पर हाल ही में देशभर में अनेक कार्यक्रम हुए, इसमें संपादकों या पत्रकारों का सम्मान हुआ। मेरा भी हुआ। पत्रकारों से जुड़ी अनेक समस्याओं का निदान दशकों बाद नहीं हो पाया है। इस पर आंदोलन की बात किसी ने नहीं की, क्योंकि उसे मीडिया संस्थान से किक लगने (धक्कों देर…) का ख़ौफ़ जो है। देशभर में 99 प्रतिशत पत्रकारों के बच्चे इस धंधे को चुनना पसंद नहीं करते। चाहे वो दिग्गज पत्रकार ओम थानवी हो या कोई और। बीकानेर से लेकर दिल्ली तक लगभग एक जैसे हालात है। दरअसल, पत्रकार नहीं चाहता कि जो स्थितियां व परिस्थितियों उन्होंने झेली है वह उनकी आने वाली पीढी झेले। नई जेनरेशन भी जब अपने घर मे समस्याओं से जुझते पत्रकार को देखती है। तो वह इससे दूरी बना लेती है। बड़े पत्रकारिता संस्थानों के पत्रकार देर रात तड़के घर लौटते है। परिवार सोया मिलता है। जब उठते है तो बच्चे स्कूल या कॉलेज चले जाते है। बच्चे घर आते है तो पत्रकार अपने आफिस पहुंच जाता है। परिवार से कट, समाज से कट। अवकाश की मंजूरी भी मुश्किल से। बात यदि वेतन की है तो यहां भी -स्थानम प्रधानम। यानी मासिक वेतन अधिकतम 2 लाख प्रति माह से लेकर 10 से 30 हज़ार के बीच। यदि दिल्ली में किसी बड़े चैनल में है तो वेतन अधिक तड़क भड़क अधिक। यदि छोटे शहर, गाँव या ढाणी में है तो अल्प वेतन यानी 10 हज़ार। जयपुर जोधपुर बीकानेर जैसे शहरों में यह 15 से 35 हज़ार के बीच है। इस पर भी यदि आपको वेतन या पद उन्नति चाहिये तो संपादक या अखबार, चैनल या न्यूज पोर्टल के मालिक संपादक की चापलूसी करो, अपना स्वाभिमान गिरवी रखकर कुटिल मुस्कान के साथ मालिक या संपादक को खुश करो। अधिकांश मीडिया संस्थानों में रिटायरमेंट की उम्र 58 या 60 साल है। सेवा से निवृत होने के बाद पत्रकार ना घर का ना घाट का। घर वाले उसे झेल नहीं पाते। समाज वालों से वह पहले ही कट चुका होता है। काम या रोजगार उसे कोई देता नही, पेंशन बनती नही। दिल्ली, जयपुर, उत्तर प्रदेश, बीकानेर सहित अन्य छोटे शहरों में अनेक उदहारण है जो सभी पत्रकारों को मालूम भी है। …क्रमश: जारी अगले अंक में।