Thar पोस्ट, न्यूज। राजस्थान,यूपी-बिहार के अधिकांश इलाकों में विभिन्न अवसरों या हथाई स्थलों या गुस्से में आकर गाली दी जाती है। विवाह के दौरान भी बरातियों को पानी पीकर न गरियाया जाए तो आज भी वो नाराज हो जाते हैं। कुछ राज्यो में तो यह परम्परा भी है। इन राज्यो में जीजा-फूफा जब घर आते हैं और खाने पर बैठते हैं तो आज भी गाली देने की परंपरा बदस्तूर जारी है, हालांकि यह गीत के रूप में होती है. अब समय के साथ संकोच बढ़ रहा है. क्योंकि रिश्तों में वो जोश और अनौपचारिकता कम हो गई है। टाउन के प्राइवेट स्कूलों में जाने वाले बच्चों को ये नहीं सुहाता. हालांकि वे खुद हिंदी के साथ अंग्रेजी गालियां सीख रहे होते हैं. दोस्तों के साथ प्रैक्टिस भी चलती रहती है. लेकिन पापा के मुंह से गाली निकल जाए तो मतलब पूछने लगते हैं.  

हताशा का भी नतीजा होती हैं ? 

गालियों को फ्रस्ट्रेशन का नतीजा भी माना जाता है. जरुरी नहीं कि आप जिसे गाली दे रहे हों वो सामने मौजूद ही हो, पीठ पीछे उन सभी लोगों को गालियां दी जाती हैं जिन्हें सामने से देना नामुमकिन होता है. इसमें बिना हानि पहुंचाए दिल का गुबार निकल जाता है. … और अगर सामने से देने का अवसर मिल जाए तो कहने ही क्या। गालियों में चु…मा..भे…गॉ..आदि का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इसका अंजाम वैसा ही हो सकता है जैसा श्रीकांत त्यागी और भाव्या का हुआ. आमतौर पर गाली गलौज करने वाले को जाहिल, गंवार माना जाता है, उस कम भरोसेमंद माना जाता है. लेकिन यह रिसर्च का विषय है. बीबीसी में छपी एक खबर के मुताबिक बच्चा 6 साल की उम्र से ही गालियां देना शुरू कर देता है. आगे इसमें ये भी बताया गया है कि व्यक्ति अपना अच्छा खासा वक्त गालियां देने में बर्बाद करता है ना केवल भारत मे बल्कि विदेशों में भी महिलाएं व पुरुष गालियां देते है।.